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कृषि ने बनाया आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर, अन्य व्यवसाय छोड़ा

अवैज्ञानिक तरीके से खेती करने से लागत तो बढती जा रही थी लेकिन फसल का उत्पादन उतना नही हो पा रहा था। इससे श्याम का खेती से लगाव कम होता जा रहा था। थक हार कर वह खेती छोड़ कोई अन्य व्यवसाय करने का मन बनाने लगे थे। लेकिन कृषि विभाग के प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल होकर उनका हृदय परिवर्तित हो गया। आज कृषि ने ही श्याम शुक्ला को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना दिया है। इस वर्ष उन्हें 13 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के मान से लगभग 35 क्विंटल सरसों का उत्पादन प्राप्त हुआ है।

श्री श्याम शुक्ला पन्ना विकासखण्ड के ग्राम अहिरगुवा के निवासी हैं। श्री श्याम बताते हैं कि लगभग 3 वर्ष पहले कृषि विभाग द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में जाने का अवसर मुझे प्राप्त हुआ। साथ ही क्षेत्रीय कृषि अधिकारी से सम्पर्क के बाद मेरे मन में खेती के प्रति फिर से लगाव उत्पन्न होने लगा था। जबकि मैं निराश होकर अन्य व्यवसाय करने का मन बना रहा था। कृषि अधिकारी द्वारा मुझे खेती के द्वारा अधिक लाभ अर्जित करने एवं फसल के साथ-साथ उससे जुडे हुए अन्य व्यवसाय अपनाने की सलाह दी गयी। शुरूआत में मुझे विश्वास नही हो रहा था कि कृषि भी मुझे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना सकती है। इस समय क्षेत्रीय कृषि अधिकारी द्वारा बार-बार मुझे प्रोत्साहित किया गया। जिसके बाद मैंने अपनी कृषि भूमि में वैज्ञानिक ढंग से खेती प्रारंभ कर दी।

श्याम बताते हैं कि पहले लागत तो अधिक थी लेकिन उत्पादन कम होता था। पर अब वैज्ञानिक ढंग से खेती करने से अच्छा उत्पादन प्राप्त होने लगा है। इस वर्ष मैंने पंक्ति में सरसों की बुवाई की थी। इससे फसल की देखरेख एवं अन्य आवश्यक कृषि गतिविधियों में भी आसानी हुई। अब मैं खेती के लिए आवश्यक खाद बगैरह भी स्वयं बनाने लगा हूॅ। इस वर्ष मुझे 13 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के मान से लगभग 35 क्विंटल सरसों का उत्पादन प्राप्त हुआ है। अच्छी आय प्राप्त होने से मेरी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गयी है। इसके लिए मैं कृषि विभाग के अधिकारियों का आभारी हॅू जिन्होंने सही समय पर मेरा मार्गदर्शन कर मुझे वैज्ञानिक खेती के लिए प्रोत्साहित किया। कृषक श्याम शुक्ला कहते हैं कि मेरी तरह अन्य किसान भाई भी खेती के वैज्ञानिक तरीके अपना कर खेती को लाभ का व्यवसाय बना सकते हैं।

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