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इच्छा मृत्यु को हरी झंडी पर जटिल प्रक्रिया

इच्छा मृत्यु जितनी सहज आकर्षित करती है, उसकी संवैधानिक प्रक्रिया उतनी ही जटिल है। वो दिन दूर नहीं रहेगा, जब भारत में मौत के मुकदमे लंबित होगें और इस बाबत भी लोकवाणी से चर्चा होगी। संभव है कि हैरान कर देने वाला भ्रष्टाचार का जिन्न यहाँ से हाहाकार करता निकल आए। 

इसके वैज्ञानिक शब्द एक्टिव यूथेनेसिव अर्थात जहर देकर माराा जाए और भारत में कोर्ट द्वारा लागू पैसिव यूथेनेसिव अर्थात लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने से मौत के दरवाजे खोल दिए जाएं। समझ सकते हैं कि जीवन और मृत्यु के संदर्भ में संवैधानिक रूप से विश्व सहित भारत में किस गहराई तक पहुंचा गया और इंसान से कितनी संवेदना है ? जिसे प्रकृति ने एकदम सहज बनाया और मृत्यु जिस पल आनी हो वह आकर रहती है। इच्छा मृत्यु को स्वीकृति देनी थी तो डाक्टर के पैनल से लेकर कोर्ट का दरवाजा खटखटाने तक की ऐसी जटिल प्रक्रिया बनाकर आखिर किसे सुविधा प्रदान करेंगे ? सनद रहे कि अक्सर ऐसा होता है कि परिवार का कोई व्यक्ति बीमारी की चपेट में आकर आर्थिक रूप से दिवालिया बना देता है और इच्छा मृत्यु के लिए कर्जदार भी होना पड़ सकता है। 

ना जीवन सहज है और ना मृत्यु सहज है, ये है इंसान का इंसान के लिए तोहफा। ये जटिल प्रक्रिया मनुष्य की मनुष्यता के संदेह में होने का परिणाम है। शीर्ष पर बैठा हुआ व्यक्ति सदुपयोग से ज्यादा दुरूपयोग की तरफ सोचता है। जब नियम कानून दुरूपयोग के दृष्टिकोण से बनाए जाएंगे तो सदुपयोग होने की निरीह कल्पना मात्र रह जाएगी। येे इच्छा मृत्यु भी इंद्र राज जैसे राजा महराजा टाइप के अमीरों के खाते में ही दर्ज हो सकती है। न्यायालय ने नियम बनाते हुए देश के गरीब आदमी को केन्द्र में रखा होता तो ऐसी जटिल प्रक्रिया कैसे बनती ? अर्थात मान लिया जाए कि राजनीति से लेकर न्यायालय तक कहीं भी गरीब आदमी का सार्वभौमिक महत्व नहीं है। सिर्फ इतना ही नहीं मध्यमवर्गीय परिवार को भी इच्छा मृत्यु साधारणतया नसीब हो सकती। 

सच है कि अगर अमीर आदमी किसी की बीमारी में खर्च के बावजूद अमीर रहता है तो अवश्य इच्छा मृत्यु मिल पाएगी वरना अरूणा सानबाग की तरह इच्छा मृत्यु दिवा स्वप्न रह जाएगा। काश हमारी सरकार और न्यायालय का चिंतन -मंथन जीवन को सहज सरल बनाने को होती। जीते जी हर आदमी को आसानी से रोजगार मिल सकता। सामाजिक रूप से प्रेममय जिंदगी व्यतीत कर सकते। सामाजिक व्याधियों से जीवन में बाधाएं ना उत्पन्न होतीं। तमाम प्रकार के पापों केे भय से मुक्ति मिल जाती। समरसता स्थापित हो चुकी होती। 

हम इच्छा मृत्यु के मुहाने तक पहुंचे पर कितने उथले रह गए। चलिए एक संघर्ष की और शुरूआत होगी। बहस करने का एक मुद्दा और मिला। राजनीतिक रोटियां इस पर भी सेकी जाएंगी और अब न्यायपालिका कटघरे पर खड़ी रहा करेगी। हर आदमी जिंदगी के किसी पल में मर जाना चाहता है, वो कहे ना कहे पर उसकी जिंदगी में कभी कोई ऐसा पल आता है कि जीने की इच्छा नहीं रह जाती। सिर्फ देह से बीमार नहीं बल्कि देह से सुंदर स्वस्थ लेकिन समाज - संविधान के मौत कुएं में जिंदगी की ड्राइविंग में वो मर जाना चाहता है। इच्छा को भी कितना जटिल बना दिया। तुम्हारे समाज - संविधान में जटिलता के सिवाय सरलता है कहाँ ? 

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