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बजट के अभाव में मनरेगा ठपए रोजगार की तलाश में पलायन तेज

मनरेगा योजना एक बार फिर संकट में पड़ गई है। सरकार  सौ दिन का रोजगार देने का दम भरने वाली यह योजना धराशायी हो गई है। इसमें मजदूरों को देने के लिए पैसा नहीं है। किसी तरह 2 जून की रोटी की जुगाड़ करने वाले मजदूर परेशान है। यूपीए की सरकार ने गांव के मजदूरों का पलायन रोकने के लिए महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना लागू की थी। यह योजना इतनी सफल हुई कि पंजीकरण कराने वाले मजदूरों को काम लेना तक मुश्किल हो गया। सभी काम मांगने वालों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए प्रति जॉब कार्ड साल भर में अधिकतम स्वदेशी रोजगार देने का प्रावधान रखा गया। नियम बनाया गया कि काम समाप्त होने के अधिकतम 15 दिनों के भीतर मजदूरी का भुगतान कर दिया जाएगा।

मनरेगा के कुल बजट का 7 प्रतिशत हिस्सा मजदूरी पर खर्च किया जा सकता है। इस में वृद्धि भी हो सकती हैए लेकिन सामग्री बचत पर 40 प्रतिशत से अधिक खर्च नहीं किया जा सकता। नतीजा यह हुआ कि गांव के लोगों का पलायन पूरी तरह से थम गया। लेकिन केंद्र सरकार के बदलने ही सबसे पहले मोदी सरकार ने इस योजना के लिए अपनी तिजोरी नहीं खोली। बाद में काफी हो.हल्ला होने पर बजट जारी किया गया। तब कहीं जाकर मजदूरों का भुगतान हो सका। कुछ समय तक तो सबकुछ ठीक रहाए मगर बाद में फिर मनरेगा पटरी से उतर गई। एक बार फिर लगभग 2 माह से बजट नहीं आया। इससे मजदूरों का भुगतान अटक गया। वर्तमान में एक लाख पचपन हजार जॉब कार्ड पंजीकृत है और इसमें से अठारह हजार मनरेगा में काम कर रहे हैं। इन्हें 175 रूपये प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान करना है। पहले एक साल में 28 लाख मानव दिवस सृजित करने का लक्ष्य था। जिसे बढ़ाकर 55 लाख मानव दिवस प्रतिवर्ष कर दिया गया है। जो 2 माह में 1500 करोड़ तक पहुंच गया।  मनरेगा सेल लगाता शासन से पत्राचार कर रहा हैए लेकिन अब तक कोई असर नहीं हुआ। इससे मजदूरों ने मनरेगा की परियोजना पर काम करना बंद कर दिया और अभी काम करने के लिए बाहर बड़े शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो गए हैं।



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