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टपरा टाॅकीज में यदि फिल्म नहीं देखी तो कुछ नहीं देखा

‘टपरा टाॅकीज’ जैसा नाम वैसा ही देखने में भी लगता है। पर सिर्फ टपरा नहीं है टपरा टाॅकीज। खजुराहो अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल का एक प्रमुख आकर्षण था ‘टपरा टाॅकीज’।

बांस, बल्ली और तिरपाल की मदद से बनाई गई यह टपरा टाॅकीज लोगों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र थी। और ऐसी एक नहीं बल्कि 5 टपरा टाॅकीज बनाई गई थीं। दरअसल कई दशक पहले तक इस तरह की टाॅकीजें हर मध्यम और छोटे शहरों में हुआ करती थीं। और उस समय सभी छोटे और बड़े लोग उन्हीं टाॅकीजों में फिल्म देखकर मनोरंजन किया करते थे। एक दौर आया जब बड़ी टाॅकीजों का निर्माण हुआ और ये टपरा टाॅकीजें लगभग लुप्त ही हो गईं। आज फिर उन्हीं टाॅकीजों को देखकर अच्छा लगा, क्योंकि जिन टाॅकीजों की वजह से ये लुप्त हो गई थीं, वही टाॅकीजें आज कम व्यवसाय करने के कारण पूरे बुन्देलखण्ड में समाप्त सी हो गई हैं। हालांकि बड़े शहरों में इनकी जगह मल्टीप्लेक्स ने ले ली है पर बुन्देलखण्ड के छोटे शहरों में अभी भी मल्टीप्लेक्स की पहुंच व्यापक नहीं है।

खजुराहो अन्तर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में इस पूरे काॅन्सेप्ट के जनक प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता व बुन्देलखण्ड के लिए अपनी आवाज हमेशा बुलन्द करने वाले राजा बुन्देला ने बताया कि फिल्म का असली मजा इन्हीं टाॅकीजों में आयेगा। बांस, बल्ली और तिरपाल की मदद से टपरेनुमा हाॅल बनाकर उसमें फर्श में ही गद्दे, चादर व तकिया डालकर जो सिनेमा हाॅल बनाया गया था, सच मानिए कि उसमें अगर आपने एक बार भी फिल्म देख ली तो मल्टीप्लेक्स को भूल जायेंगे। रूई के गद्दों पर लेटकर ठंड में रजाई ओढ़कर बड़े पर्दे पर फिल्म बहुतों ने नहीं देखी होगी। पर यह सब मजा यहां के लोगों को देने वाले राजा बुन्देला कहते हैं कि इस प्रकार की टाॅकीजें पूरे बुन्देलखण्ड में खोलने पर बात चल रही है। बुन्देलखण्ड के कई शहर तो ऐसे हैं कि जहां एक भी टाॅकीज नहीं है। यानि यहां सिनेमाहाॅल में मनोरंजन के लोग तरस रहे हैं। ऐसे में यह नई ‘टपरा टाॅकीज’ दर्शकों को जरूर पसन्द आयेगी।

इस आयोजन में मुख्य भूमिका निभाने वाले जगदीश शिवहरे बताते हैं कि लोगों को ये टपरा टाॅकीज बेहद पसन्द आईं। यहां तक कि मुम्बईया फिल्म कलाकार तो बहुत ही आश्चर्य व्यक्त कर रहे थे, इसे देखकर। आने वाले वक्त में बुन्देलखण्ड के लिए वरदान होंगी ये ‘टपरा टाॅकीजें’।



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