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सेक्स सीडी वाली गंदी राजनीति

चुनाव आते ही सरगर्मियों का स्तर जितना तेज होता है, उतना ही तेजी से नैतिक स्तर भी गिरने लगता है। हालिया प्रकरण गुजरात में पाटीदार आंदोलन के नेता हार्दिक पटेल से जुड़ा हुआ है। एक सेक्स सीडी सोशल मीडिया से लेकर टीवी चैनल में चर्चा का विषय बनी हुई है। इससे हार्दिक के चरित्र का आकलन किया जा रहा है। सबसे पहली बात यही है कि जिस देश में महाभारत जैसे धर्म युद्ध का ऐतिहासिक वर्णन है। उस देश के राजनीतिक युद्ध में सेक्स काण्ड का प्रवेश हो चुका है।

हर बार सोचते हैं कि चुनाव विकास पर होगा, ऐसे मुद्दे होंगे जिनसे जनता को सीधे लाभ पहुंचेगा। लेकिन राजनीति के चतुर बनिए हर बार चुनाव को ऐसे मुद्दों की तरफ मोड़ देते हैं, कि जनता को तिनका मात्र भी लाभ नहीं होता। फिर भी जनता इनके कुचक्रों में फंसकर भावुकता में मतदान कर जाती है।
विचारणीय तथ्य यह है कि क्या सेक्स करना अपराध है? और शादी से पूर्व अथवा शादी के बाद सहमति से सेक्स करना आखिर कैसा अपराध है? पुरुष हो अथवा महिला, दोनों ही बालिग होने के उपरांत इतने स्वतंत्र क्यों नहीं हैं कि वे प्रकृति प्रदत्त सुखानुभूति के लिए स्वेच्छा से सहवास भी कर सकें? इस बात पर नजर रखना कि कब, कौन, कहाँ और क्या कर रहा है? आखिर ये कितना जायज कहा जा सकता है कि यौन इच्छा की पूर्ति के लिए ऐसे सामाजिक मापदण्ड बने हैं, जिनमें सिर्फ और सिर्फ शादी ही एकमात्र विकल्प है। उस पर भी ऐसी शादी जिस पर सामाजिक ताने-बाने की जाति-धर्म वाली मुहर लगी हो। ऐसी स्वतंत्र और शुचिता कब आएगी जब सामान्य प्रक्रिया से जन्मी यौन इच्छा को लगातार दबाना ना पड़े और इस विषय पर घर-परिवार तथा समाज से युवक-युवती को जागरूक करना कैसे शुरू होगा?

हम हाथों में हथकड़ी सह नहीं पाते लेकिन सामाजिक आडम्बर और तमाम प्रकार के बुर्कानशीं इज्जत मान-मर्यादा वाली मन और आत्मा पर इतनी हथकड़ी जकड़ी हुई हैं कि मनोविज्ञान के आधार पर मानसिक व शारीरिक विकास में रूकावटें आ जाती हैं। जिनका परिणाम एक दिन देश को भुगतना पड़ता है। ऐसे में इस प्रकार की राजनीति सिर्फ और सिर्फ विकृत मानसिकता के राजनीतिक धुरंधरों को पच सकती है, जिनका मकसद सिर्फ सत्ता हथियाना है। इन लोगों को उस समाज का तनिक भी भान नहीं है, जहाँ यौन इच्छाओं का इन सामाजिक ठेकेदारों द्वारा शोषण ना किया जाए।

गीता में भी एक जगह वर्णन है कि किसी की आत्मा को दुखाना ही सबसे बड़ी हिंसा है और राजनीति के तमाम लम्बरदार गीता भेंट करते हुए पढ़ने व मनन करने की वकालत तो करते हैं, परंतु निजी जीवन से लेकर सामाजिक जीवन तक गीता का इनके तन-मन में शायद ही कहीं रूपान्तरण हो पाता है। एक देश के नागरिक के तौर पर कम से कम इतनी स्वतंत्रता का हक होना चाहिए कि जब जहाँ चाहें वहाँ अनुकूलता के आधार पर अपना जीवन साथी और सहवास करने का निर्णय स्वयं ले सकें। हमारी निजता पर किसी भी अराजक तत्व का हमला तमाम विकृत मानसिकता को जन्म देता है। हर जगह पुरूष और स्त्री के बीच इतने पहरेदार लगे हुए हैं कि मित्रता जैसे रिश्ते का भी बामुश्किल ही स्थान रह गया है। जबकि एक स्त्री भी किसी पुरुष से आत्मीयता महसूस कर सकती है और अपना मित्र बनाने को सोच सकती है। परन्तु इस बात की कल्पना भी बेमानी हो जाती है कि एक स्त्री अपने पुरुष मित्र के साथ घर, सड़क और किसी भी होटल आदि स्थान पर खड़ी हो सके या बात कर सके। शादीशुदा महिला के लिए किसी पुरुष के साथ मित्रता एक दिवा स्वप्न की तरह होती है। बहुत से पुरुष अपनी पत्नी को इस बात की इजाजत नहीं देते कि वो किसी की मित्र बन सकती है। यहाँ तक कि विवाह के वक्त ही पर-पुरूष के लिए सात वचनों के एक वचन में हिदायत दे दी जाती है और यही हिदायत पुरुष को पराई स्त्री के लिए भी दी जाती है। हालांकि पुरुष और महिला के बीच बड़ा फर्क है लेकिन महिलाएं भी इस सीमा को लांघ रही हैं। यही वो विद्रोह है जिसको समाज में पाप करार दिया जाता है।

हार्दिक पटेल का बस इतना सा ही मामला है कि वो उस सीडी में एक महिला के साथ सहवास करते दिखाई दे रहे हैं। अब एक पुरूष और महिला सहवास नहीं कर सकते तो आखिर ये बंदिश और चरित्र हनन की कोशिशें हमें किस दिशा व दशा की ओर ले जाएंगी? यहाँ बात सिर्फ हार्दिक पटेल की नहीं है बल्कि सम्पूर्ण भारत के उस समाज के प्रत्येक युवक-युवती के संग समाज के भविष्य की है, जो इस प्रकार के मानसिक अवसाद की ओर ले जाने वाली बंदिशों से स्वयं को ही कहीं ना कहीं शिकार बना रहा है। क्या एक राजनीतिक व्यक्ति का व्यक्तिगत जीवन कुछ भी नहीं है? राजनीति में यौन सम्बन्ध बनाना अपराध कब और कैसे हो गया? जब ये इच्छा शादी जैसे बंधन में बंधने का इंतजार नहीं करती और एक निश्चित उम्र से जन्म लेने लगती है तो फिर कैसे ऐसी इच्छा का दमन करके एक व्यक्ति के साथ न्याय हो सकता है? कुल मिलाकर इस प्रकार की राजनीति और सामाजिक दमन चुनाव जीतने हारने में शायद मददगार हो जाए किन्तु यह देश और समाज के लिए बेहद घातक प्रवृत्ति है, जिसका दंश हम आज भी बलात्कार और हत्या के रूप में देखते रहते हैं, कहीं ना कहीं ये सब भी कारक हैं।

एक अच्छे समाज के निर्माण के लिए संयम के साथ स्वतंत्रता पर सदैव विचार करना होगा और इस प्रकार की राजनीतिक छींटाकशी से बचकर ही देश व समाज को बचाया जा सकता है। हार्दिक को भी इस बात को समझना चाहिए कि यहाँ बात गुजरात की महिलाओं की नहीं है बल्कि देश की महिलाओं की बात है। अफसोस है कि इस वक्त उनकी जुबान भी चुनावी जुबान बनी हुई है। किसी की भी जुबान देशहित की जुबान शायद ही बन रही हो, जो समाज के हित में हो। स्वच्छ व स्वस्थ समाज के लिए तन, मन और आत्मा से सटीक विश्लेषण के साथ वक्त के अनुसार सही दिशा में स्वतंत्रता के पैमाने को निर्दिष्ट करना होगा एवं इस प्रकार की गंदी राजनीति की सदैव निंदा की जानी चाहिए।



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