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दीपावली के पंचपर्वों का पौराणिक महत्व

‘दीपावली’ को ‘हिन्दू धर्म’ में पंचपर्वों का त्योहार कहा जाता है। जो धन त्रयोदशी (धनतेरस) से प्रारम्भ होकर यम द्वितीय (भइया दूज) को समाप्त होता है। पंचपर्वों के अन्तर्गत धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा एवं यम द्वितीय (भइया दूज) सम्मिलित हैं। स्थानाभाव के कारण इस वर्ष हम इन पर्वों के अति महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर ही प्रकाश डाल रहे हैं। आगामी वर्षों में पाठकों के लाभार्थ प्रत्येक पर्व पर पौराणिक महत्व का विस्तृत उल्लेख सप्रमाण अवश्य करेंगे।

1.यमदीपदान (स्कन्द पुराण): कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन सायंकाल घर के बाहर दरवाजे के बगल में ‘यमराज’ के निमित्त तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए। इस दीपक को जलाने से उस परिवार में एक वर्ष तक किसी भी व्यक्ति की अकाल मृत्यु नहीं होती है।

"कार्तिकस्य असितपक्षे त्रयोदश्यां निशामुखे।
यमदीपं बहिर्दघात् ‘अपमृत्यु’ र्विनश्यति।।"       (स्कन्द पुराण)

 

2. नरक चतुर्दशी (पद्म पुराण/ब्रह्म पुराण): कार्तिक कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को ‘यम चतुर्दशी’ भी कहा जाता है। इस दिन प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व (ब्रह्म मुहूत्र्त) मेंउठकर नरक लोक में जाने से डरने वालों को तिल के तेल को लगाकर स्नान करना चाहिए। इसके बाद प्रातः काल होने पर यमराज के निमित्त 14 नामों से दक्षिण की ओर मुख करके तिल लेकर जल से तीन-तीन बार तर्पण करना चाहिए।

"यमाय धर्म राजाय मृत्यवे चान्तकाय च।
वैवस्वताय कालाय सर्वभूतक्षयाय च।।
औदुम्बराय दध्नाय नीलाय परमेष्ठिने।
वृकोदराय चित्राय-चित्रगुप्ताय वै नमः।।"   (मत्स्य पुराण)

यमराज के उपरोक्त 14 नामों से तर्पण करने मात्र से मनुष्य द्वारा साल भर का किया हुआ पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है और सायंकाल चार बत्त्ती वाला दीपक तेल का जलाना चाहिए।

हनुमत् जयन्ती (वायु पुराण): कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को हनुमान जी के जन्म का उल्लेख मिलता है।

        "आश्विनस्यासिते पक्षे स्वातयां भौमे चतुर्दशी।
        मेष लग्ने अन्जनी गर्भात्स्वयं जातो हरः शिवः।।"   (वायुपुराण)

इस दिन हनुमान जी के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में हनुमान जी की मूर्ति पर गन्धपूर्ण तेल से युक्त सिंदूर मिलाकर चोला चढ़ाकर भक्ति-भाव से षोडशोपचार पूजन-अर्चन वन्दन करना चाहिए। हनुमत् स्त्रोत पाठ, सुन्दरकाण्ड का पाठ करना चाहिए तथा हनुमान जी के निमित्त सायंकाल घी के दीपकों को हनुमान जी के मन्दिर में जलायें। इस प्रकार विधिपूर्वक हनुमान जी का जन्मोत्सव मनाने से कल्याण होता है।

3. दीपावली (लक्ष्मी पूजा): कार्तिक कृष्ण पक्ष अमावस्या सायंकाल प्रदोष काल में लक्ष्मी जी की विधिपूर्वक पूजा करने का शास्त्रादेश है।

”दीपान्दत्त्वा प्रदोषे तु लक्ष्मीं पूज्य यथाविधि।
स्वलंकृतेन भोक्तव्यं सितवस्त्रोप शोभिना।।“
प्रदोष समये लक्ष्मी पूजयित्वा ततः क्रमात्।
दीपवृक्षाश्च दातव्या शक्त्या देव गृहेषुच।।“     (भविष्य पुराण)

इस दिन सायंकाल (प्रदोषकाल) में षोडशोपचार विधि से अपनी सामथ्र्य के अनुसार सुसज्जित, अलंकार युक्त सुन्दर शोभायमान दीपमालिका प्रकाश से युक्त उजाले में लक्ष्मी जी की पूजा करके उत्सव मनायें। अनेक दीपकों के द्वारा लक्ष्मी जी की आरती करने के कारण इसको ‘दीपावली’ कहा है।

4. गोवर्धन पूजा (स्कन्द पुराण): दीपावली के दूसरे दिन प्रातःकाल प्रत्यक्ष गोवर्धन पर्वत की पूजा करें। प्रत्यक्ष गोवर्धन पर्वत के अभाव में मकान के द्वारदेश में गौ के गोबर से अथवा अन्न के ढेर से गोवर्धन पर्वत का स्वरूप बनाकर गन्ध, पीत, पुष्पादि से पूजन करके गोवर्धन की परिक्रमा करें।

"प्रातःगोवर्धनं पूज्य यूतं चापि समाचरेत्।
भूषणीयास्तथा गावः पूज्याश्चावाह दोहनाः।।"

गोवर्धन पूजा के पश्चात् गायों को स्नान कराकर सजाकर नाना प्रकार से अलंकृत करके गायों, बछड़ों की पूजा-अर्चना करें। गायों की परिक्रमा करें। मंत्र इस प्रकार है:

        ”लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता।
        घृतं वहति यज्ञार्ये मम पापं व्ययोहतु।।“        (हेमाद्रि)

अन्नकूट यथार्थ में गोवर्धन पूजा का ही समारोह है।

5. यम द्वितीया (भइया दूज) (ब्रह्माण्ड पुराण): कार्तिक शुक्ल द्वितीया तिथि पौराणिक सन्दर्भ में भाई-बहन के लिए विशेष महत्वपूर्ण है। इसी दिन भगवान सूर्य की पुत्री यमुना ने अपने भाई यमराज (धर्मराज) को अपने घर में उत्तम भोज्य पदार्थों का भोजन कराया था। इसलिए यह द्वितीय तिथि यमद्वितीया (भइयादूज) के नाम से विख्यात है। इस दिन प्रातःकाल यमुना नदी में स्नान करने का विशेष महत्व है। दोपहर बाद चित्रगुप्त एवं यमदूतों के सहित यमराज और यमुना जी का विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। ताँबे के पात्र में जल, पुष्प, चन्दन, अक्षत से बहन यमराज को अघ्र्यप्रदान करे। इस द्वितीया में प्रयत्नपूर्वक भाई को बहन के घर जाकर बहन द्वारा की हुई पूजा को ग्रहण करे और बहन अपने द्वारा बनाये गये सुभोज्य पदार्थों से भाई को भोजन कराये। इसके बाद भाई अपनी बहन को सामथ्र्य के अनुसार वस्त्र, द्रव्य देकर बहन से शुभ आशीष प्राप्त करे।

स्मरण रहे विशेष: इस दिन भाई को अपने घर में भोजन नहीं करना चाहिए। सगी बहन के न होने पर परिवार, रिश्तेदारी में लगने वाली बहन अथवा मित्रादि की बहन के घर में भोजन करे।

”यस्यां तिथौ यमुनया यमराजदेवः सम्भोजितः प्रतिजगत्स्वसृसौहृदेन।
तस्यां स्व साकर तुलादिह यो भुनक्ति प्राप्नोति रत्न सुखधान्य मनुत्तमं सः।।

इस तिथि में जो मनुष्य अपनी बहन के हाथ से इस संसार में भोजन करता है। वह उत्तम धन-धान्य सुखों से समृद्ध होकर दीर्घायु प्राप्त करता है।

    ”या तु भोजयते नारी भ्रातरं युग्मके तिथौ।
    अर्चयेच्चचापि ताम्बूलैः न सा वैधव्यमाप्नुयात्।।
    भ्रातुरायुःक्षयो राजन्न भवेतत्र कर्हिचित्।“        (ब्रह्माण्डपुराण)

जो स्त्री (बहन) अपने भाई को इस दिन भोजन कराती है और ताम्बूलों से पूजा करती है वह बहन कभी भी ‘विधवा’ नहीं होती है। कभी भी उसके भाई की आयु का क्षय नहीं होता है। ऐसा न करने पर सात जन्मों तक भाई का सुख नहीं प्राप्त होता है। अतः भाई-बहन दोनों को अपने-अपने कल्याण के लिए इस दिन उपरोक्त शास्त्र नियम का पालन अवश्य करना चाहिए इससे दोनों को लाभ होगा। इसके विपरीत नहीं करना चाहिए।

 

     पं. सूर्यकान्त त्रिपाठी
      लेखक श्री ऋषि वामदेव ज्योतिष शोध संस्थान बाँदा के निदेशक हैं)



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