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सन्डावावीर उत्खनन से मिले नवपाषाणकालीन संस्कृति के साक्ष्य

हफ़्तों की जद्दोजहद और मेहनत के बाद अंततः आज राजापुर के कलवलिया गाँव स्थित सण्डवावीर टीले में चल रहे सीमित उत्खनन से पुरातत्व विभाग की टीम को नवपाषाणिक धरातल प्राप्त हुआ । उत्खनन कर रही टीम का नेतृत्व कर रहे डॉ. अवनीश चन्द्र मिश्र और इस स्थान का पता लगाने वाले क्षेत्रीय लुरात्त्व अधिकारी डॉ. रामनरेश पाल का मानना है कि शिकार और संग्रह से जनजीवन स्थायी निवास की ओर उन्मुख था , कृषि एवं पशुपालन के प्रारम्भ का यह समय था।  कृषि समाज स्थायी निवास की ओर अग्रसर हो चुका था ।

फिलहाल अभी तक उत्खनन से हस्त निर्मित मिटटी के बर्तन , हड्डियां तथा नवपाषाणिक त्रिभुजाकार कुल्हाड़ी प्राप्त हुई है। इसी स्थान से ताम्र पाषाणिक स्तर से झोपड़ी के साक्ष्य , मनके , लघु पाषाण उपकरण , हड्डी की मोहरे एवं हर्थ आदि प्राप्त हुए हैं । इसी प्रकार एनबीपी के धरातल से काले चमकीले पात्र , कटोरे , थाली स्टोरेज जार ,हर्थ एवं झोपड़ी के साक्ष्य एवं स्तम्भ गर्त आदि प्राप्त हुए हैं । इसके अलावा इस उत्खनन में शुंग ,गुप्त एवं कुषाण काल के भी पात्र प्राप्त हुए हैं ।

आपको बता दें कि राजापुर के निकट कलवलिया एवं डुडौली गांव के मध्य स्थित टीले पर विगत 19 सितम्बर से डॉ. शकुन्तला मिश्रा राष्ट्रीय पुनर्वास विश्वविद्यालय लखनऊ द्वारा उत्त्तर प्रदेश पुरातत्व विभाग की क्षेत्रीय इकाई इलाहाबाद के सहयोग से उत्खनन लगातार जारी है ।

सबसे खास बात ये है कि अभी तक के उत्खनन से तीन संस्कृतियां प्रकाश में आईं हैं - नवपाषाणकाल , ताम्र पाषाणकाल एवं ऐतिहासिक काल की संस्कृति ।इनके साथ ही उत्खनन स्थल से उत्तरी काली चमकीली पात्र-परंपरा तथा शुंग ,कुषाणकाल एवं गुप्त के पात्र भी प्रकाश मे आये हैं । गौरतलब है कि सण्डवावीर की खोज डॉ. राम नरेश पाल के की थी । इसके बाद डॉ शकुंतला देवी पुनर्वास विवि लखनऊ के प्रो अवनीश चंद्र मिश्र एवं अस्टिटेंट प्रोफेसर डा. बृजेश चन्द्र रावत ने भी उक्त स्थान का निरीक्षण किया और फिर उस स्थान पर उत्खनन कार्य के किये प्रस्ताव किया ।

प्रो. अवनीश चंद्र मिश्र ने बताया कि शकुंतला मिश्रा पुनर्वास विवि लखनऊ के कुलपति प्रो. निशिथ राय की विशेष अभिरुचि से इस उत्खनन कार्य को मूर्तरूप दिया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सबसे मुख्य बात एक ये भी है कि संडवावीर स्थल का उत्तखनन सीमित दायरे में किया गया और 5*5 मीटर की 4 खंतिया डाली गई जिसके उद्देश्य सांस्कृतिक उत्कम को जानना था ।

इस स्थान का पता लगाने वाले क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. रामनरेश पाल ने बताया कि संडवावीर स्थल के उत्तर पश्चिम से लगभग डेढ़ किमी की दूरी से उच्च पुरापाषाणकाल के उपकरण सतह से प्रकाश में आये हैं । स्थल से दक्षिण लगभग एक किमी दूरी से बाल्मीकि नदी के बाएं तट के क्षेत्र से गुप्त ,कुषाण एवं मध्यकाल के उपकरण भी प्राप्त हुए हैं । उन्होंने कहा कि ये दर्शाता है कि यह क्षेत्र पाषाणकाल से लेकर निरन्तर मानव की क्रीड़ास्थली रहा है । आने वाले दिनों में जिसके और बड़े राज खुलने की उम्मीद है । यहां यह बताना भी बहुत आवश्यक है कि नवपाषाणकाल की संस्कृति के विंध्य क्षेत्र एवं गंगा घाटी जे स्थलों का उत्खनन किया जा चुका है । जहाँ से इसी प्रकार के बर्तन प्राप्त हुये हैं । संडवावीर और कौशाम्बी के उत्तरी काली चमकीली पात्र परंपरा में बहुत समानता दिखाई पड़ती है ।

जानकारों की मानें तो इस क्षेत्र में सबसे निचले धरातल से नवपाषाणिक संस्कृति के प्रमाणों का मिलना पुरातात्विक इतिहास की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है । इस स्थल के लगभग डेढ़ किमी की परिधि में पाषाणकाल से लेकर मध्यकाल तक के उपकरणों का सतह से मिलना सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाता है ।

मेरी लिए रिपोर्टिंग के दौरान व्यक्तिगत ये सबसे खास पल थे जिनका साक्षी बनना वाकई गौरव की बात है । आज हजारो वर्ष पुराने अपने पूर्वजों के द्वारा प्रयोग किये जाने वाले पत्थर के हथियार व सामानों को अपने हाथों में रखकर छूना भावुक करने वाला था । विश्वास ही नही हो रहा था कि इन्ही पत्थरों का प्रयोग नवपाषाणकाल के हमारे पूर्वजों ने अपने सामाजिक क्रियाकलापों के दौरान हजारों वर्ष पहले किया था । लेकिन ये सत्य है ।

आज पुनः उन दोनों महान विभूतियों से मुलाक़ात हुई जिन्होंने इस दशक के सबसे बड़े उत्खनन को अंजाम दिया और इतनी बड़ी खोज दुनिया के सामने लाये । जिसमे सबसे प्रमुख हैं इस स्थान का पता लगाने वाले क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी डॉ. रामनरेश पाल एवं उत्खनन कर रही टीम का नेतृत्व कर रहे शकुन्तला देवी पुनर्वास विवि लखनऊ के प्रो. अवनीशचन्द्र मिश्र । गर्व होता है हम उस क्षेत्र के निवासी हैं जहाँ इतनी पुरानी और समृद्ध सभ्यता निवास करती थी । गौरान्वित करने वाला पल है हम सभी के लिए । अब एक बार फिर समूची दुनिया की बोलती बंद हो जायेगी ।

उत्खनन कार्य कर रही इस टीम में नेतृत्व कर रहे प्रो अवनीश चन्द्र मिश्र, इस स्थान को खोजने वाले डॉ. रामनरेश पाल ,इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रो. बृजेश चन्द्र रावत, शिविर प्रबन्धक वीरेंद्र शर्मा ,शोध छात्र राजेश कुमार ,पार्थ सिंह कौशिक एवं सलाहकार डॉ. जे.एन. पाल एवं डॉ. एम. सी.गुप्ता सम्मिलित रहे ।



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