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साढे तीन साल की बच्ची और मोबाइल पर एडल्ट सीन

साढ़े तीन साल की बच्ची क्या कुछ कर सकती है और क्या नहीं कर सकती है। पहले के जमाने में इस उम्र के बच्चे एकदम मासूम एवं दुनिया जहाँ के उस भाग से अनजाने ही माने जाते थे, जिस दुनिया से वयस्क जन वाकिफ होते हैं। एक वयस्क और बालिक जीवन तथा मासूम बच्चों के जीवन में बड़ा भारी अंतर होता है। परंतु आधुनिक युग में एक क्लिक में दुनिया जहाँ के एकदम समीप मासूम बच्चे भी पहुंच रहे हैं। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि पिछले दिनों बस यात्रा के दौरान महज साढ़े तीन साल की बच्ची अपने माता-पिता के संग मेरे साइड से बैठी थी। मेरी नजर खिलौने की तरह एंड्रॉयड मोबाइल से खेलते हुए बच्ची पर पड़ी। शुरूआती दौर में देखते हुए अच्छा महसूस हुआ कि जिस उम्र में ठीक से हाथ पैर नहीं चलते, उस उम्र में बच्ची बड़े सलीके से स्क्रीन टच मोबाइल को बिना किसी गलती के आपरेट कर रही थी। उसने राजनैतिकए सामाजिक और बालीवुड से जुड़े तमाम गीतए संगीत और कार्टूनिस्ट वीडियो देख डाले। अच्छा है कि ज्ञान का सृजन होगा। लेकिन अगले ही पल जो कुछ नजर के सामने आया वो अवाक् कर देने वाला था।

बच्ची ने देखा एडल्ट वीडियो एंड इमेज
महज एक क्लिक में दुनिया संसार का वह नजारा बच्ची के सामने था जो सिर्फ और सिर्फ बालिक तथा 40़ उम्र आदि के लोगों के लिए ही समाज अथवा संवैधानिक रूप से मान्य है। फिर भी नैतिकता के आधार पर ऐसे गंदी मानसिकता के वीडियो हमेशा किसी के लिए भी नुकसानदेह हैं। मानव मस्तिष्क और मानसिकता पर ऐसा गहरा प्रहार हो जाता है कि ऐसी घटनाएं घटित होती हैं कि समाज को शर्मसार कर देती हैं। कल्पना कीजिए कि एक 5 वर्ष से कम उम्र की बेटी एकाएक एंड्रॉयड मोबाइल पर सेक्सुअल पिक्चर और वीडियो देखती है। जैसे जैसे वो वयस्क होगी और उसका रूझान हार्मोंस के सक्रिय होने के साथ अपोजिट सेक्स की तरफ बढ़ेगा और बचपन की याददाश्त ताजा होने के बाद उस पर क्या अंकुश लग पाएगा। उसकी अपने माता-पिता के प्रति कैसी सोच बनेगी। ये सब चिंतनीय तथ्य हैं कि इंटरटेनमेंट एंड इंटरनेट के इस युग में बच्चे महज एक क्लिक में जिंदगी का रास्ता तो नहीं भटक जाएंगे। इसलिये पैरेंट्स का मोबाइल भी साफ सुथरा होना आवश्यक है। एक उम्र हो जाने पर संभव है कि एडल्ट मूवी एंड इमेज देखकर आपको संतुष्टि मिलती हो या फिर सेक्स के लिए तैयार होने में मदद मिलती हो लेकिन अगर आपके बच्चे हैं तो कोई दिन आप शर्मसार इससे बेहतर यही हो सकता है कि पहले तो मोबाइल में ऐसी सामग्री होनी नहीं चाहिये फिर भी रखते हों तो हाइड अप्लीकेशन का प्रयोग करके बच्चों की पहुंच से ऐसी सामग्री दूर रखें। जिससे उनकी मानसिकता पर अच्छा असर पड़ेगा।

अचानक से उस बच्ची के पिता की नजर पड़ जाती है और वो सिर्फ इतना कहते हुए मोबाइल छीन लेते हैं कि क्या चालू किए हो। एक मासूम बच्ची क्या जानेगी कि उसने क्या चालू कर रखा है, गलती तो पैरेंट्स की जिन्होंने ऐसी सामग्री डाऊनलोड कर रखी है। इसलिये शारीरिक व भौतिक जगत की स्वच्छता के साथ सबसे अधिक मानसिक स्वच्छता और स्वस्थता की जरूरत है। सावधानी ही वास्तव में बचाव है। हमारी तरफ से समाज को जागरूक करने के लिए यह एक विशेष पहल है। जिसे समाज के हर वर्ग को महसूस करना होगा।

भारत का प्रत्येक नागरिक इस बात को जानता है कि महाभारत काल में अभिमन्यु ही वह योद्धा थाए जिसने गर्भ में ही चक्रव्यूह भेदकर तोड़ना सीख लिया था फिर भी अंतिम द्वार तोड़ने का ज्ञान उसे माँ के सो जाने की वजह से नहीं हो पाया था। स्पष्ट है कि माँ की एक चूक मान लीजिए अथवा ऐसा हुआ तो उसकी मौत का कारण भी वही रहा। इसलिये सुख सुविधाओं के इस युग में माता-पिता की एक चूक बच्चों के सम्पूर्ण जीवन के लिए बड़ी घातक सिद्ध हो सकती है। 

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