?> एकता की मिसाल रामा की सवारी बुन्देलखण्ड का No.1 न्यूज़ चैनल । बुन्देलखण्ड न्यूज़ विविधता में एकता के दर्शन न केवल भारत की अपनी विशेषता"/>

एकता की मिसाल रामा की सवारी

विविधता में एकता के दर्शन न केवल भारत की अपनी विशेषता है वरन् बुन्देलखण्ड के जनपद बांदा की भी है। बुन्देलखण्ड और बघेलखण्ड की सम्मिलित संस्कृतियों के केंद्र जनपद बांदा में 267 साल पहले एक मराठी ने मुस्लिमों के प्रमुख पर्व मोहर्रम में एक ऐसी मिसाल कायम की जो सांप्रदायिक सद्भाव की मिसाल बन गई। और 267 साल से जली यह मशाल आज बांदा ही नहीं बल्कि समूचे बुन्देलखण्ड में हिंदू और मुसलमानों के बीच भाई-चारे के रूप में जल रही है। हिंदू मुसलमानों के दिलों में आपसी प्रेम का बीजारोपण करने वाला रामा एक मराठी सैनिक था।

इतिहास पर नजर डालें तो सन् 1729 में पन्ना के महाराजा छत्रसाल ने पुणे के पेशवा बाजीराव प्रथम से इलाहाबाद के मुगल सूबेदार मोहम्मद खान बंगश के विरुद्ध सहायता मांगी और उसे परास्त करने पर महाराजा छत्रसाल में अपने राज्य का एक तिहाई भाग, जिसमें बांदा से चित्रकूट का इलाका शामिल था, बाजीराव को दे दिया और उन्होंने उन्हें अपना तीसरा पुत्र भी माना। पेशवा बाजीराव 28 अप्रैल 1740 में दिवंगत हो गए परन्तु उनके उत्तराधिकारी बालाजी बाजीराव ने सन 1750 में उनकी नर्तकी रानी मस्तानी के पुत्र अली बहादुर प्रथम को इस तोहफे में मिली जागीर का प्रबंध करने के लिए मराठों के पूरे लाव-लश्कर के साथ बांदा का नवाब बनाकर भेजा। उसी काफिले में रामाजी बाद आए जब वह बांदा आए तो उस समय मोहर्रम में सिर्फ ताजियादारी होती थी।

नवाब साहब के काफिले में रामाजी ढाल सवारी लेकर पैदल बांदा आये। और उन्होने नए सिरे से सवारी-ढाल रखने व अलाव खेलने की शुरुआत की। अलाव, मोहर्रम की नवीं तारीख को होता है, इस दिन में रात्रि में 4 फीट चैड़ा गड्ढा खोदकर उसमें एक कुंटल से ज्यादा लकड़ियां जलाई जाती हैं। लकड़ियां जब जलकर आग के अंगारों में बदल जाती हैं तब 10 दिन तक व्रत रखने वाले युवक नहा-धोकर आते हैं और ढोल-ताशे की आवाज पर थिरकते हुए दहकते अंगारे में कूदकर फूल की मानिंद आग के शोलों को हवा में उछाल कर फेंकते हैं। इसके बाद अलाव कूदने वाले युवक हाथों में ढाल लेकर जुलूस के साथ इमाम और बुजुर्गों की मजार पर जाते रात भर गश्त करते हैं, इन्हें सवारियों का जुलूस भी कहा जाता है। रामा द्वारा मोहर्रम में की गई यह शुरुआत मुसलमानों को भी भा गई और उन्होंने ताजियादारी के साथ अलाव व ढाल-सवारी निकालने की शुरुआत कर दी।

रामाजी मुहर्रम का चांद दिखते ही अपने परिवार व घोड़ों (सवारी) सहित चारपाई पर सोना व पैरों में जूते पहनना बंद कर देते थे। रामाजी के अलाव में आग के मातम को देखकर न केवल हिंदू मुसलमान बल्कि अंग्रेज भी सोचने लगे कि शायद रामाजी कोई बूटी लगाकर आग में कूदते हैं। अंग्रेज कलेक्टर मिस्टर स्वान ने डाॅक्टर भेजकर अलाव खेलने के पूर्व रामाजी के हाथ-पैरों की जांच कराई, केवल इतना ही नहीं अलाव में लोहे की छड़ें भी गड़वा दीं। इस अंग्रेज कलेक्टर ने लड़कों को साधारण जल में स्नान करते देखा, फातिया, रब्बानी व लोबान की धूनी हुई। ताशा ढोल बजने लगे। चारों ओर 2 गज जमीन सुर्ख लाल हो रही थी, तभी रामाजी दहकते अंगारों में कूद पड़े और दोनों हाथों से आग के अंगारे उछालना शुरू कर दिया। फिर दोनों गर्म सलाखों को हाथ से पकड़कर गुलेल की तरह झुका दिया। तत्काल वहां मौजूद डाॅक्टर ने हाथों व पैरों का निरीक्षण किया, कोई जलने के चिन्ह नहीं थे, यह चमत्कार देखकर अंग्रेज कलेक्टर मिस्टर स्वान चकित थे। उन्होंने रामाजी को बख्शीश दी, जिसे रामाजी ने यह कहकर ठुकरा दिया कि हम कोई खेल-तमाशा नहीं करते हैं। यही नहीं कलामत मोहल्ले के एक हाजी ने भी जो स्वयं कट्टर मुसलमान थे, रामाजी के इस मातम का मखौल उड़ाया। उसने उनकी परीक्षा लेने के वास्ते कोतवाली के आगे ढाल में पूरी सड़क पर अंगारे बिछवा दिए। सारी सवारियां रामाजी की सवारी-ढाल का इंतजार करते हुए रुकी थीं।

रामाजी उस समय तक वृद्ध हो चुके थे, उनके शागिर्द उन्हें पीठ में लादकर उस स्थान पर ले गए। रामाजी ने उन्हें अंगारों को उठाकर सवारी को लोभान की धूनी दी, व यह कहकर, ”मौला, मैं तो गैर मुस्लिम हिंदू मराठा हूं, आज तेरी उम्मत ही तेरी परीक्षा ले रही है“ बैठे-बैठे ही उन अंगारों पर सरकना शुरु कर दिया। न केवल रामाजी की सवारी बल्कि सारी सवारियों का जुलूस उन्हीं अंगारों पर चलकर बगैर किसी नुकसान के निकल गया। हाजी जी को मौला का दण्ड मिला, सुबह होते ही उनकी इकलौती संतान अल्लाह को प्यारी हो गई। रामाजी 100 साल तक जिए, उनके निधन के बाद उनके भांजे नत्थू सिंह ने इमामबाड़े की बागडोर संभाली। नत्थू ने इमामबाड़े की इमारत भी बनवाई, आज भी वह इमारत उनके प्रेम और विश्वास की प्रतीक बनी है। रामाजी द्वारा मोहर्रम में शुरू की गई नई परम्परा को मुसलमानों ने ग्रहण किया और हिंदू भी मोहर्रम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगे। अब अकेले बांदा शहर में 50 से ज्यादा इमामबाड़े हैं, जिनमें मोहर्रम की नवीं तारीख को अलाव कूदे जाते हैं। अलाव कूदने वालों में आधे से ज्यादा हिंदू सम्मिलित होते हैं। रामाजी द्वारा हिंदू-मुस्लिम एकता की जो मिसाल कायम की गई है वह कहीं और दिखाई नहीं देती। यही वजह है कि देश के भले ही किसी हिस्से में सांप्रदायिक दंगे हुए हों या होते हों लेकिन बांदा में कभी भी सांप्रदायिक दंगों की आंच तक नहीं पहुंची।

6 दिसंबर 1992 को अयोध्या विध्वंस के बाद जहां पूरा देश अशांत हो गया था, उस वक्त भी बांदा में कौमी एकता बरकरार रही। नत्थू सिंह के बाद उनके साले रघुनाथराव ने 62 वर्ष रामाजी की सवारी उठाई। उनके समय एक ही व्यक्ति नवीं-दसवीं दोनों दिन सवारी उठाता था। रघुनाथ के समय में ही एक बार मुल्क की आजादी के समय एक बार सांप्रदायिक तनाव के तहत जो मुल्क के बंटवारे में उमड़ा था, बांदा में मुसलमानों ने मोहर्रम नहीं मनाया। सारी सवारियां नहीं उठीं और न ही इमामबाड़े खोले गए। परन्तु इस साल केवल रामाजी की सवारी रखी गई व अलाव खेला गया। इसकी तारीख को कर्बला तक पूरे रास्ते में हजारों लोगों की भीड़ थी, बांदा शहर ही नहीं आसपास के क्षेत्रों के लोग भी रामाजी की अकेली सवारी का मंजर देखने को इकट्ठा थे। शहर के पूरे रास्ते में व कर्बला के मैदान में घरों की छतों, चहारदीवारी व पेड़ों पर भी लोग चढ़े थे। सवारी के कर्बला पहुंचते ही जो लोग मजबूरीवश मोहर्रम ना मना सके थे, रामाजी की सवारी का पटाखा चूमकर दहाड़ें मार-मार कर रो रहे थे, वो चीख-चीख कर कह रहे थे कि आज हिंदू होकर रामाजी की सवारी ने कर्बला जाकर मोहर्रम मनाकर मुसलमानों की लाज रख ली।

इस घटना में न केवल बांदा में बल्कि पूरे देश में हिंदू-मुस्लिम एकता व सद्भाव की मिसाल कायम की। रघुनाथराव के समय में ही उनकी बीमारी के कारण नत्थू सिंह के नवासे वसंतराव को इमामबाड़े की जिम्मेदारी मिली, तब से आज तक वसंतराव इमामबाड़े की सेवा करते चले आ रहे हैं। हालांकि अब उनका पुत्र यशवंतराव अलाव खेलता और सवारी उठाता है। समय का चक्र कभी नहीं रुकता, युग बदलते देर नहीं लगती। पीढ़ियां गुजर गईं, सदियां बीत गईं, पेशवा राज खत्म हुआ, बांदा में नवाबों का भी अंत हुआ, अंग्रेज आए और एक सदी से भी ज्यादा राज करके चले गए। रामाजी का इमामबाड़ा, इन सब घटनाओं का साक्षी है। समय के इन सब परिवर्तनों के बाद भी रामाजी द्वारा सन 1750 में स्थापित इमामबाड़ा उसी रुप में उसकी शानो-शौकत के साथ अपनी परम्परा आज भी कायम किए हुए है।

आज भी अलाव खेलते वक्त केवल रामाजी के अलाव में अंगारे समेटने के लिए झाड़ू नहीं लगाई जाती और सारे घोड़े (सवारी) व उन को पकड़ने वाले शुद्ध रहकर उन्हीं अंगारों पर चलकर निकलते हैं और रामाजी के घोड़े नंगे बदन ही ढाल उठाते हैं। आज भी रामाजी की सवारी अपनी मर्जी से कभी-कभी उन पुरानी मजारों व स्थानों की ज़ियारत करती है जिन्हें हम पीढ़ियों से भुला चुके हैं। नवीं व दसवीं मोहर्रम को पूरी रात व पूरे दिन सारा शहर ढोल-ताशों की आवाज से गूंज जाता है। लोग दूर-दूर से अपने रिश्तेदारी में आकर बांदा के मोहर्रम व यहां के हिंदू-मुस्लिम सद्भाव व एकता की मिसाले देते हैं। रामाजी के नक्शे-कदम पर ही बांदा के अलावा बुन्देलखण्ड के झांसी, हमीरपुर, हरपालपुर, महोबा, मऊरानीपुर, पन्ना, छतरपुर व अजयगढ़ इत्यादि में भी अलाव होने लगे। मोहर्रम के दौरान लोग रामाजी के इमामबाड़े को अपना बुजुर्गवार मूल इमामबाड़ा मानकर रामाजी की सवारी को रिवाज-ए-अक़ीदत पेश करते हैं। जब रामाजी की सवारी निकलती है तो जहां कहीं भी भीड़ होती है, लोग स्वतः ही उनके सम्मान में रास्ता छोड़ देते हैं। काश रामाजी द्वारा शुरू किए गए इस बेशकीमती तोहफे की हिफाजत होती रहे और उनकी सौगात ता कयामत इसी प्रकार बरकरार रहे, ताकि मजहबी एकता कभी खत्म न हो।


- अनिल सिंह

 



चर्चित खबरें