?> अवैध खनन की बात पर सारे नियम ताक पर बुन्देलखण्ड का No.1 न्यूज़ चैनल । बुन्देलखण्ड न्यूज़ उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन इसलिये हुआ था कि समस्"/>

अवैध खनन की बात पर सारे नियम ताक पर

उत्तर प्रदेश में सत्ता परिवर्तन इसलिये हुआ था कि समस्त अवैध धंधे, अवैध खनन आदि पर लगाम लग जाएगी। सूबे में जब से योगी सरकार का उदय हुआ तब से ऐसा महसूस हुआ कि मानो अब सब कुछ पटरी पर आ जाएगा। पर इतने समय बाद क्या खनन माफिया का दमन हुआ है अथवा नहीं? चिंता इस बात पर भी है कि प्रशासन कि मंशा कितनी साफ है? हालिया अवैध खनन का मामला वामदेव ऋषि के स्थान बांदा के नरैनी तहसील का है। नरैनी से लगभग 5 किमी. दूर पनगरा गांव का एक पहाड़ रो-बिलख रहा है कि उस पर धमाके किए जा रहे हैं, ड्रिलिंग की जा रही है और जेसीबी द्वारा खुदाई शुरू है। लेकिन हम आपको बताते हैं कि अफसरों की मिली भगत आखिर क्या कुछ बयां करती है?

आईये मामले को समझते हैं
इस पहाड़ में 2015 तक दो पट्टाधारक खनन का कार्य कर रहे थे। 2015 में सुबेन्द्र यादव के पट्टे की अवधि समाप्त होने के बाद अब केवल एक ही पट्टाधारक शिवधनी पाण्डे इस पहाड़ पर खनन का कार्य कर रहे हैं। लेकिन इसमें अवैध क्या है? पूर्व पट्टाधारक सुबेन्द्र यादव यह आरोप लगाते हैं कि शिवधनी अपने पट्टे पर खुदाई करने के साथ-साथ पूर्व में उनको आबंटित पट्टे पर भी खुदाई कर रहे हैं। जबकि यह पट्टा वर्तमान समय में समाप्त हो चुका है। जबकि शिवधनी पाण्डेय बताते हैं कि सुबेन्द्र यादव के अपने पूरे पट्टे का खनन कर लिया है। और सुबेन्द्र यादव के पट्टे के पीछे उनका पट्टा आता है लिहाजा वह अपने पट्टे पर ही खनन कर रहे हैं। सुबेन्द्र यादव शिवधनी पाण्डे पर आरोप लगा रहे हैं तो वहीं शिवधनी पाण्डे उन्हें जबरन परेशान करने का आरोप सुबेन्द्र पर लगा रहे हैं।

शिकायत के बाद हुई लीपा-पोती
अवैध खान बंद कराने हेतु पूर्व पट्टाधारी द्वारा शिकायती पत्र के जरिए सूचना दी गई। किन्तु नरैनी के पूर्व जिलाधिकारी द्वारा लिखित रूप से बताया गया कि पूरी नरैनी तहसील में कहीं भी अवैध खनन या अवैध परिवहन होता नहीं पाया गया। वहीं खनिज अधिकारी ने भी स्वयं जांच की और उन्होंने भी पाया कि उक्त पहाड़ में कहीं भी अवैध खनन नहीं हो रहा। खनिज अधिकारी ने तो पूर्व एसडीएम के निस्तारण पत्र को ही आधार बनाते हुए पूरे मामले को बबलगम की तरह चबा डाला। आखिर ऐसा किया भी क्यों ना जाए, जब सबके सब बुन्देलखण्ड की खनिज सम्पदा को लूटकर अपनी कोठियां भरने और कोठियां बनाने में लगे हैं। इससे स्पष्ट है कि पूर्व एसडीएम की जेब कितनी भरी गई होगी और उस वक्त ट्रांसफर द्वारा नरैनी की जनता का धन लूटकर चलते बने हैं। प्रश्न यह खड़ा होता है कि इस एसडीएम को जनता दरबार में अदालत के कटघरे तक कब और कैसे लाया जाएगा अथवा ये सब ऐसे ही मुट्ठी से रेत की फिसलने की तरह कानून की जकड़ से फिसल जाएंगे।

अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि खनिज अधिकारी की आंखों की जांच योगी सरकार को करा लेनी चाहिए। समझ में नहीं आता कि एक शिक्षित अधिकारी ऐसा लिखित बयान कैसे दे सकता है? खनिज अधिकारी ने बिना तथ्य की जांच किए लिख दिया कि वहाँ अवैध खनन/परिवहन/आवागमन के चिन्ह नहीं पाए गए। बड़ी हास्यास्पद बात है कि जब उसी पहाड़ में एक ओर वैध खनन भी चल रहा है, और वाहन आ जा रहे हैं तो फिर यह कह देना कितना बड़ा दुस्साहस है। मशीनों के ना मिलने की बात भी असम्भव है। क्योंकि वहाँ वैध खनन के सारे सबूत एक तरफ हैं तो दूसरी तरफ अवैध खनन के समस्त सबूत मौजूद हैं। शायद इसको ही कहते हैं कि माल भरी पेटी मिल गई तो खनिज अधिकारी प्राकृतिक सम्पदा से खिलवाड़ कर तथा कानून की धज्जियां उड़ाते हुए जिला प्रशासन की आंखांे में धूल झोंकते रहेंगे और अवैध खनन माफियाओं को संरक्षण भी प्रदान करते रहेंगे।

हमारी पड़ताल

अवैध खनन की जमीनी हकीकत
जब हमने पनगरा स्थित पहाड़ का सूक्ष्म निरीक्षण एवं विश्लेषण किया तो पाया कि शिवधनी पाण्डे अपने पट्टे के साथ-साथ दूसरे पट्टे में भी खनन कर रहे हैं, जोकि अवैध है। हमने पाया कि जहाँ खनन कार्य चल रहा है वहाँ पूर्व में सुबेन्द्र यादव के नाम पट्टा था। जो पट्टा अब वैधानिक रूप से वजूद में नहीं है अर्थात वहाँ पर खनन कार्य बन्द है। किन्तु शिवधनी पाण्डे लगातार उस पट्टे पर खनन कर रहे हैं जो उनको आवंटित ही नहीं है। हमने नक्शे का भी अध्ययन किया तो भी शिवधनी पाण्डे का दावा झूठा साबित हुआ। सुबेन्द्र यादव का तर्क बिल्कुल जायज लगा कि शिवधनी पाण्डे उसको पूर्व में आबंटित पट्टे पर अवैध खनन करा रहे हैं।

ब्लास्टिंग और मशीनों की नहीं है कोई परमीशन
शिवधनी पाण्डे जो भी खनन करा रहे हैं उसके लिए ब्लास्टिंग की परमीशन की आवश्यकता होती है, जोकि वाराणसी स्थित सेफ्टी माइन्स कार्यालय से मिलती है, इसी तरह मशीनों की परमीशन भी उसी कार्यालय से ही मिलती है। शिवधनी पाण्डे ने यह स्वीकार किया कि वाराणसी से उन्होंने कोई परमीशन नहीं कराई है। जब हमने वाराणसी के सेफ्टी माइन्स के डायरेक्टर पी.के. ठाकुर से फोन पर इस बात की तस्दीक की तो उन्होने भी बताया कि बाँदा, चित्रकूट व महोबा सहित काफी स्थानों पर अवैध ब्लास्टिंग हो रही है। इस बावत उन्होने कई बार सम्बन्धित जिलाधिकारियों को भी अवगत कराया है पर किसी ने भी इस बात को गम्भीरता से नहीं लिया और लगातार अवैध ब्लास्टिंग चालू है।

नहीं हुई सर्वेयर की नाप
किसी भी खनन को करने के लिए सर्वेयर की नाप बहुत जरूरी होती है और यदि सर्वेयर ने अपनी रिपोर्ट में लिख दिया कि यहां खनन नहीं हो सकता तो वहां वास्तव में खनन नहीं किया जा सकता। पर इस मामले में सर्वेयर को ही नजरअंदाज कर अवैध खनन का खेल शुरू है। यदि शिवधनी पाण्डे ने सर्वेयर से नाप व जांच कराई होती तो निश्चित ही उन्हें इस स्थान पर खनन की परमीशन नहीं मिलती। क्योंकि पहाड़ के चारों ओर बस्ती है। ब्लास्टिंग और खनन से लोगों की जान को खतरा हो सकता है, इसीलिए सर्वेयर द्वारा कभी भी इस स्थान पर ब्लास्टिंग इत्यादि से खनन की परमीशन नहीं मिलती। पर इस सम्बन्ध में बांदा के खनिज अधिकारी आर.पी. सिंह का कुछ और ही कहना है। आर.पी. सिंह कहते हैं कि सर्वेयर किसी भी पट्टे पर उक्त आधार पर खनन से मना नहीं कर सकता।

मजदूरों की सुरक्षा के साथ खिलवाड़
इस अवैध खनन के खेल में तमाम मजदूरों की जिन्दगी भी दांव पर लगा दी गई है। नियम के मुताबिक मजदूरों को सिर में पहनने के लिए कैप, पैरों में जूते, मुंह व नाक में लगाने के लिए डस्ट मास्क के साथ ईयर प्लक मिलने चाहिए। पर वहां कोई नंगे पैर तो कोई चप्पल पहने खनन कार्य कर रहा था। सेफ्टी बेल्ट सबसे बड़ा मानक है जोकि बिल्कुल नदारद था। मतलब किसी भी मजदूर का यदि पैर फिसला तो सीधे पहाड़ से टकराते हुए नीचे कई सौ फिट आकर गिरता। ईश्वर न करे कि किसी के साथ ऐसा हादसा हो, पर अवैध खनन करने में पूरी तरह डूब चुके शिवधनी पाण्डे सारे नियमों को ताक पर रखे हुए हैं।

रात में होती है ब्लास्टिंग
मानकों के बिल्कुल विपरीत रात में यहां ब्लास्टिंग कराई जाती है। यह बात स्वयं शिवधनी पाण्डे ने हमारे रिपोर्टर से कही और इस बात की तस्दीक वहां आसपास रहने वाले लोग भी करते हैं। रात के सन्नाटे में ब्लास्टिंग से पूरे वातावरण का तापमान बढ़ जाता है साथ ही प्रदूषण में भी वृद्धि होती है। मानक कहते हैं कि रात और सुबह का समय ब्लास्टिंग के लिए नहीं है। ब्लास्टिंग दोपहर के बाद होनी चाहिए। इस बात की जानकारी हमें खनिज अधिकारी आर.पी. सिंह ने भी दी।

खनिज अधिकारी को भी नहीं पता पूरे मानक
खनिज अधिकारी आर.पी. सिंह से जब हमने बात की तो हमें महसूस हुआ कि खनन के सम्बन्ध में शासन द्वारा जो भी मानक बनाये गये हैं, उसमें उनकी जानकारी बहुत ही कम है। यहां तक कि उनके पास नियमावली भी मौजूद नहीं थी। हमारा सवाल है कि यदि मानकों के अनुसार काम नहीं होना तो बेकार में नियम बनाने की यह मेहनत क्यों की जाती है? क्या मानकों की आड़ में अवैध वसूली करने के लिए? क्या किसी भी अधिकारी को उसके पूरे अधिकार पता नहीं होने चाहिए? अवैध खनन की शिकायत करने वाले सुबेन्द्र यादव तो खनिज अधिकारी पर बड़ा ही गम्भीर आरोप लगाकर कहते हैं कि खनिज अधिकारी प्रतिमाह हजारों रुपये रिश्वत लेते हैं, और प्रतिमाह उनके घर पर चावल, दाल व घी-तेल पहुंचाने की जिम्मेदारी शिवधनी पाण्डे की है। इसी का लाभ शिवधनी पाण्डे ले रहा है और खनिज अधिकारी चुपचाप सारा तमाशा देख रहे हैं। खनिज अधिकारी से जो भी हमारी बातें हुईं तो खनिज अधिकारी पूरी वार्ता में लगातार शिवधनी पाण्डे का बचाव करते नजर आये। जो इस बात की तस्दीक करने के लिए काफी है कि पनगरा में अवैध खनन को खनिज अधिकारी का वरद हस्त प्राप्त है।

करोड़ों अरबों के इस अवैध खेल जिसमे तमाम आला अफसर की जेब भरी जाने की पूर्ण संभावना नजर आती है। मतलब जनता समझ ले कि उनके चैकीदार ही सबसे बड़े लुटेरे हैं।



चर्चित खबरें