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जनता नहीं है डकैत, पुलिस करती है उत्पीड़न: भैरों मिश्रा

 

शाम का धुंधलका छाया है, तभी आहट होती है। घर के सदस्य एकाएक चौंक उठते हैं, हे भगवान ! अब क्या होगा? एक-एक करके करीब दर्जन भर डकैत आ धमकते हैं। घर के लोग तो वैसे ही उन्हें देखकर सहमे हुए हैं, ऊपर से डकैतों की बन्दूकों की उठी हुई नालें उन्हें सिर झुकाने पर मजबूर कर देती हैं। न जाने आज सुबह-सुबह किसका चेहरा देखा था। यह सोचते हुए घर का मुखिया अचानक लगे जोरदार धक्के से नीचे गिर पड़ता है। डकैतों का फरमान है कि आज उनका गैंग इसी घर में रात्रि विश्राम करेगा। घर में डकैतों के लिए भोजन बनाने की शुरुआत हो जाती है। लेकिन एक हिदायत ये भी कि किसी भी प्रकार से यदि पुलिस को सूचना देने की कोशिश की तो जान ले लेंगे ये डकैत।


  • दो पाटों में पिसते पाठा के ग्रामीण

ये किसी फिल्म की स्टोरी नहीं है। ये स्टोरी आये दिन पाठावासियों के साथ दोहराई जाती है। पुलिस कहती है कि ये ग्रामीण डकैतों को संरक्षण देते हैं पर ग्रामीणों का कहना है कि जब घर में घुसकर उनके सीने पर बन्दूक लगा दी जायेगी तो उनके पास डकैतों को घर में रुकाने व भोजन कराने के अलावा चारा ही नहीं होता। वे तो सीधे गोली मार देते हैं। क्या कोई भी अपनी जान की परवाह नहीं करेगा? अपने घरवालों की जान की परवाह किसे नहीं होती?
सीधे-सादे पाठावासी पिछले कई दशकों से डकैतों का जुल्म और सितम झेलते आ रहे हैं। अधिकांश ने तो इसे नियति ही मान लिया है। कहते हैं न कि पुलिस और शासन से रोकर गिड़गिड़ाकर तो एक बार बच जायेंगे पर डकैतों से कैसे बचेंगे? उनकी मदद न करो तो सीधे गोली से बात करते हैं। जान प्यारी है तो डकैतों को पनाह देना उनकी मजबूरी बन जाती है। बात करते करते बुन्देलखण्ड न्यूज से कई ग्रामीण पूंछते हैं कि आखिर सरकार और प्रशासन उनकी मजबूरी क्यों नहीं समझता? क्यों उन्हें व उनके परिवार के सदस्यों को आये दिन पुलिस उठा लेती है।

चित्रकूट पुलिस अधीक्षक प्रताप गोपेन्द्र की माने तो सभी ग्रामीण डकैतों को संरक्षण नहीं देते। बस कुछ हैं इनके मददगार, उन्हीं पर पुलिस की विशेष निगाह होती है। जरूरत पड़ती है तो उनसे पूंछतांछ करनी होती है। बेवजह प्रताड़ित करना पुलिस का काम नहीं है। लेकिन डकैतों को संरक्षण देने वालों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जायेगा। श्री गोपेन्द्र बताते हैं कि डकैतों के होने की पक्की सूचना पर जब पुलिस उन्हें पकड़ने पहुंची तो नागर गांव के कई लोगों ने पुलिस टीम पर पथराव कर दिया। बाद में पुलिस ने वहाँ से ग्राम प्रधान के पति को गिरफ्तार किया तो ग्राम प्रधान ने सांसद व भाजपा जिलाध्यक्ष से मदद की गुहार लगाई।

उधर बाँदा चित्रकूट सांसद भैरों प्रसाद मिश्रा कहते हैं कि पुलिस अपना काम ठीक से करती होती तो उन्हें बीच में नहीं आना पड़ता। यदि निर्दोष जनता को पुलिस बेवजह परेशान करेगी तो मेरा कर्तव्य है कि अपनी जनता का ध्यान रखूं। सांसद श्री मिश्रा कहते हैं कि ग्रामीणों ने पुलिस पर आरोप लगाया है कि उन्हें डकैतों को संरक्षण देने के आरोप में बुरी तरह से मारा-पीटा गया। बताईये भला, ग्रामीण तो डकैत से डरा-सहमा रहता है। हमेशा डकैतों के साये में रहने वाले इन भोले-भाले ग्रामीणों को अपनी जान बचाने के लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ता। दो पाटों में पिसने को मजबूर हैं ये ग्रामीण। और पुलिस कहती है कि ये डकैतों को संरक्षण देती है। पुलिस की कारगुजारियों को बताते हुए भैरों प्रसाद मिश्रा पूंछते हैं कि आखिर मानिकपुर एसओ पर क्यों नहीं हुआ पथराव? बहरहाल सांसद भैरों प्रसाद मिश्रा की हुई पुलिस अधीक्षक से नोकझोंक के बाद मानिकपुर एसओ को तत्काल सस्पेंड कर दिया गया था।

आगे भी डकैतों के डर से ग्रामीण यूं ही चक्की के दो पाटों के बीच पिसते रहेंगे? एक सवाल जिसके जवाब का इन्तज़ार किसी को भी नहीं है.. शायद सभी जानते हैं। अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें।

 

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