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होली में टूट गई मटकी फोड़ने की परंपरा

बांदा,

होली प्रेम उल्लास हंसी ठिठोली का त्यौहार है। इसे बुन्देलखण्ड में अलग अलग तरीके से मनाया जाता था, लेकिन अब कुछ परंपरागत मान्यताएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं। पहले होली का चंदा न देने वाले व्यक्तियों के घरों में शरारती युवकों द्वारा कीचड़ व गंदगी मटकी में भरकर उनके घरों में फोडी जाती थी। फिर भी लोग बुरा नहीं मानते थे, लेकिन अब लोगों द्वारा विरोध शुरू होने से यह परंपरा लगभग खत्म सी हो गई है।

यह त्यौहार युवाओं की टोलियां के लिए ठठोली और मौज मस्ती का त्यौहार है। यह टोलियां होलिका दहन से पहले घर घर से चंदा वसूल करती थी, जो चंदा देने से मना करता था, उसके घर में होली जलने के बाद नालियों का कंधा कीचड़ या डीजल आज फेंका जाता था। लेकिन तब बुरा मानने से यह परंपरा खत्म सी हो गई है। बसंत पंचमी से होलिका उत्सव शुरू हो जाता है। लगभग हर मोहल्ले व चैराहों में उसी स्थान पर एक पीले रंग का झंडा गाड़ दिया जाता है जहां पर होलिका दहन होना है।

जब होली कुछ दिन रह जाती है तब युवक अलग-अलग समूह में एकत्र होकर होली के लिए लकड़ी एकत्र करते थे। अब पर्यावरण को बचाने की मुहिम शुरु होने से हरे पेड़ नहीं काटे जाते हैं।फिर भी होलिका उत्सव के लिए युवक अलग अलग तरीके से चंदा धन संग्रह करते हैं, हर चैराहे में अबीर गुलाल लगाकर लड़के चंदा मांगते थे।जो चंदा देने से आनाकानी करता है उसका कोई न कोई समान छुपा दिया जाता था।

पत्रकार सुधीर निगम बताते हैं कि पहले लड़के सेफ्टीपिन को धागे में बांधकर बिजली के तार  के सहारे लटका देते थे, जो चंदा नहीं देता था उसका कपड़ा या कोई अन्य सामान सेफ्टीपिन के सहारे ऊपर खीेच लिया जाता था। उसका सामान तभी मिलता था जब वह चंदा दे देता था। लेकिन धीरे-धीरे  विरोध बढ़ने से युवाओं ने चंदा देने का यह तरीका बंद कर दिया। इसी तरह होली के एक दिन पहले घर घर से चंदा वसूल किया जाता था। जो चंदा नही देता था। उसके घर में होली जलने के बाद कीचड़ भरी मटकिया फोड़ी जाती थी। जिससे उसका पूरा घर तहस नहस हो जाता था। तब लोग जमकर गाली गलौच कर के शांत हो जाते थे। बुरा नहीं मानते थे लेकिन धीरे-धीरे इस मामले में झगड़े होने लगे जिससे यह परंपरा खत्म हो गई।

इसी तरह गांवों में भी होली में जमकर हुड़दंग होता था। होलिका दहन शुरू होते ही हुड़दंग शुरू हो जाता था। लोग एक दूसरे पर कीचड़ उछालते थे। रंग से भरे टंकियों में लोगों को डाल देते थे। गांवों में चंदा न देने वालों के घर व आंगन में कीचड़ मल मूत्र फेंकने की परम्परा थी। जो अब खत्म हो गई है। समाजसेवी राजाभैया बताते हैं कीचड़ गंदगी फेंकने की गैर सामाजिक परंपरा से अक्सर मारपीट की घटनाएं होने लगी। होली का त्यौहार हिंसक रूप लेने लगा इससे धीरे-धीरे यह परंपराएं लुप्त होने लगी हैं। वह कहते हैं कि होली का त्योहार आपसी भाई चारे के साथ मनाया जाए जिससे किसी तरह की हिंसा की संभावना नहीं रहती है।
 

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