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किसने ध्वस्त की हजारों साल पुरानी जैन तीर्थकर आदिनाथ की प्रतिमा

@रजनीश जैन, चंदेरी 

ड्रिल मशीनों के जरिये तोड़ी गयी विशाल जैन प्रतिमा 

जिस तरह अफगानिस्तान के बामियान में हजारों साल प्राचीन प्रतिमाओं को नष्ट किया गया था। ठीक इसी तरह बुन्देलखण्ड के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल, ऐतिहासिक नगर चंदेरी के खंदारगिरि पर्वत में स्थापित एक हजार साल पुरानी 46 फुट ऊंची प्रथम जैन तीर्थंकर आदिनाथ की प्रसिद्ध जैनप्रतिमा को ड्रिल मशीनों की मदद से नष्ट किया जा रहा हैं इसकी न तो पुरातत्व विभाग को खबर हैं और न ही सरकार को जानकारी हैं। तो फिर किसकी अनुमति से पुरातत्व महत्व की इस प्रतिमा को नष्ट करने का कुचक्र रचा गया।

चंदेरी के खंदारगिरि में जैन प्रतिमाएं और प्रतिमाओं से सज्जित गुफाओं का निर्माण प्रतिहारवंशी राजाओं द्वारा सन् 900 से 1226 तक कराया गया था। यह जानकारी वहां के शिलालेखों से मिलती है। इस पहाड़ के आसपास ब्राह्मी लिपि के लेख और जैन तीर्थंकरों के चिंहों की 2100 वर्ष पुराने पत्थरों पर उत्कीर्णन को हाल ही में स्थानीय इतिहासकार डा. अविनाश जैन ने खोजा है। शैलचित्रों से भरे आदिमानवों के शैलाश्रयों की भी श्रंखलाएं है।

  

जाहिर है भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने इस पूरे क्षेत्र को घोषित कर रखा है। ऐसी स्थिति में वहां की सबसे प्रसिद्ध 46 फीट की आईकान प्रतिमा को तोड़े जाने की खबर पुरातत्व विभाग को न हो यह संभव नहीं है। तोड़ने वाली जैन संस्था को ऐसी विनाशकारी अनुमति किसने दी है। यह जांच का विषय है। बताया तो यह भी जा रहा हैं कि इस प्राचीन प्रतिमा को ध्वस्त करने के लिए कर्फ्यू जैसा माहौल बनाया गया हैं, उपरोक्त पहाड़ के आसपास किसी को आने जाने नही दिया जा रहा हैं। जिससे पता नही चल पा रहा हैं। वंहा स्थित किन किन प्रतिमाओं को निशाना बनाया जा रहा हैं। 

बुन्देलखण्ड में प्रसिद्ध जैन प्रतिमाओं को तोड़ कर वहां दूसरी प्रतिमा यह पहला मामला नहीं है। लगता है कि किसी समूह या व्यक्ति विशेष की इच्छानुसार सभी प्राचीन प्रतिमाओं को बदल देने का अभियान चल रहा है। लेकिन इसमें पूरे जैन संप्रदाय को विश्वास में क्यों नहीं लिया जा रहा। क्या इस साजिश के पीछे दिगंबर जैनों के भीतर ही फिरकों या पंथों का संघर्ष काम कर रहा है। लेकिन उनके इस आपसी संघर्ष से भारतीय पुरातत्व अधिनियम को क्या लेना देना। ऐतिहासिक  स्मारकों का संरक्षण उसका कानूनी दायित्व है।

बुन्देलखण्ड की प्राचीनतम जैन प्रतिमाओं को पूरा तोड़ कर उनकी जगह नई बनाने के पीछे की मंशा महज जीर्णोद्वार को लेकर समझ नहीं आती। बताया जाता है कि इनकी जगह नई बनाई जा रही प्रतिमाओं में मूल प्रतिमा के साथ उकेरी गई विग्रह प्रतिमाओं, यक्ष यक्षिणी, द्वारपाल, देव प्रतिमाओं को दोबारा नहीं बनाया जा सकता। माना जा रहा हैं कि बीस पंथी और तेरह पंथी जैन आमनाओं का मतभेद है जिसका निशाना हजार साल पुरानी प्रतिमाएं बन रही हैं। यदि ऐसा नहीं है तो इतने बड़े पर्वत पर किसी भी जगह उससे बड़ी और सुंदर प्रतिमाएं नई स्थापित की जा सकती हैं। इतिहास को विकृत करने की क्या आवश्यकता है? इस सम्बन्ध में जैन समाज के अध्यक्ष महावीर जैन से जानकारी करने की कोशिश की गयी, लेकिन उनसे बात नही हो सकी। 

 

 

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