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शिक्षा अधिकारी ने किया झंडे का अपमान

बाँदा | विशेष रिपोर्ट

ब्लाॅक संसाधन केन्द्र यानि बीआरसी। सरल भाषा में कहें तो बेसिक शिक्षा का ब्लाॅक स्तरीय सबसे बड़ा आॅफिस। और यहां का अधिकारी खण्ड शिक्षा अधिकारी कहलाता है जिसे एबीएसए भी कहा जाता है। अब बात शिक्षा की है तो जान लीजिए कि अध्यापकों, जिन पर बच्चों को शिक्षित करने की जिम्मेदारी होती है, उनसे उम्मीद की जाती है कि उनका ज्ञान, अनुशासन व कर्तव्य पालन औरों से श्रेष्ठ हो। पर इन अध्यापकों के ऊपर भी कोई होता है जो खण्ड शिक्षा अधिकारी, बेसिक शिक्षा अधिकारी और न जाने कौन-कौन होते हैं, जिनसे ये सारे अध्यापक भय खाते हैं। पर क्यों? क्या ये जल्लाद होते हैं? अरे साहब, कुछ अध्यापकों की माने तो कभी-कभी ये जल्लादपन की उस सीमा को भी लांघ जाते हैं जो कालांतर से चली आ रही है। विद्यालय पहुंचने में एक मिनट की भी देरी अध्यापक को लगभग 5 से 10 हजार की पड़ जाती है। यानि अध्यापक नियम तोड़ दे तो उसके लिए सजा के व्यापक प्राविधान हैं। इतनी लम्बी चैड़ी सजा जिससे बचने के लिए अध्यापक भी न चाहते हुए वो समझौता करने पर राजी हो जाता है, जो उसकी अंतरात्मा को मंजूर नहीं होता। पर नौकरी तो करनी है न साहब! और नौकरी में जो समझौता न करे, उसकी गुजर-बसर साधारणतया सम्भव नहीं है।

ये तो हो गई वो कहानी जिसे जानना आपके लिए जरूरी है। पर ये भी जानिए कि जब ये अधिकारी गलती करते हैं तो इन्हें कितना समझौता करना पड़ता है। उत्तर की तह में जायेंगे तो पता चलेगा, कि इन्हें समझौता करने की जरूरत ही नहीं पड़ती। पर क्यों? चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत तो सुनी होगी। बस अन्दाजा लगाते रहिए....  

अब आते हैं असल मुद्दे पर जहां एक अधिकारी ने उस देश के राष्ट्रध्वज का अपमान कर डाला, जिसे आज पूरी दुनिया सलाम कर रही है। विश्व का सबसे शक्तिशाली राष्ट्र भी आज उस देश के आगे याचक की तरह खड़ा है। वह है भारत, हमारा भारत। जो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कूटनीति के चलते विश्व गुरू बनने की राह पर है। और उस देश के राष्ट्रध्वज का अपमान हो जाये, ये बात सुनने में बड़ी अजीब लगती है, पर सच है।

बाँदा जनपद में बड़ोखर खुर्द बीआरसी में आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी एवं पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती पर राष्ट्रध्वज फहराया गया पर जानबूझ कर उसे उल्टा फहराया गया। जी हां, जानबूझकर हम इसीलिए कह रहे हैं क्योंकि इनसे तो कोई गलती हो ही नहीं सकती। जब ये दूसरों की गलतियों को चेक करते हैं तो ये तो कोई गलती कर ही नहीं सकते। तो फिर जो भी घटित होगा वह जानबूझकर ही किया जायेगा। ऐसा हमारा मानना है, आपका क्या मानना है, हमें नहीं पता। पर सोचकर देखियेगा, और खासकर उस अध्यापक की नजर से सोचियेगा जो इन अधिकारियों की प्रताड़ना से आये दिन तंग रहता है। तो क्यों न माने कि राष्ट्रध्वज का ये अपमान जानबूझकर किया गया है।

भारतीय झंडा संहिता में उल्लिखित सरकारी कार्यालयों के लिए बने नियमों के मुताबिक यदि उल्टा राष्ट्रध्वज फहराया जाता है तो सीधे-सीधे यह धारा 4 के बिन्दु 3.19 का उल्लंघन हैै। जिसमें कहा गया है कि ‘केसरिया’ पट्टी को नीचे करके झंडा नहीं फहराया जायेगा। यहां इस ध्वज को जानबूझकर उल्टा फहराया गया जिससे केसरिया रंग नीचे रखा जा सके।

धारा 3 के बिन्दु 3.6 के अनुसार झंडे को बिना मौसम की परवाह किए सूर्योदय से सूर्यास्त तक फहराया जाना चाहिए। इस नियम का भी उल्लंघन किया गया जब यहां दोपहर 2 बजे हमारे संवाददाता ने जाकर देखा तो कार्यालय बंद हो चुका था और स्थानीय लोगों ने बताया कि कार्यालय बंद होते ही झंडा भी उतार कर रख लिया गया था। आप फोटो भी देख सकते हैं कि कार्यालय बंद है और झंडा भी नहीं है।

नियम तो बहुत हैं और मानना भी सबके लिए जरूरी है। इस बात पर जोर भी दिया जाना चाहिए। और कम से कम उनसे तो इनके पालन की उम्मीद रखी जा सकती है जो अपने से अधीनस्थों को नियम पालन न करने पर नोटिस देते हों या इसकी आड़ में फायदा उठाने और  प्रताड़ित करने की कोशिश करते हों। नियमों का पालन सभी को करना चाहिए, आम आदमी हो या अधिकारी। कम से कम शिक्षा विभाग को तो पालन करना ही चाहिए, चूंकि यह विभाग ही शिक्षा देने का है। और इस शिक्षा विभाग का अधिकारी माने सब कुछ आता हो, पूरा ज्ञान हो। और यदि नहीं है तो अधिकारी कैसे बन गया? इस पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है। 
 

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