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ना मैं बालू माफिया हूँ, ना भू माफिया हूँ, बहूँ हूँ बेटी की तरह सेवा करूंगी

@सौरभ चन्द्र द्विवेदी, चित्रकूट  

कांग्रेस प्रत्याशी रंजना पांडेय जनसंपर्क के दौरान जनता से स्वयं का परिचय बहू और बेटी के स्वरूप में देती हैं। उनका कहना है कि अवसर बार - बार दरवाजा नहीं खटखटाता। यह उपयुक्त समय जनता के लिए भी है और प्रत्याशी के तौर पर मेरे लिए भी ! उन्होंने कहा कि बड़े दुर्भाग्य कि बात रही कि राजनीति माफियाओं का शिकार होती रही है। वर्तमान समय में बहुत कम देखने को मिलता है कि माफियाओं को छोड़कर किसी काम करने वाले मध्यमवर्गीय परिवार के शख्स को प्रत्याशी बनाया गया हो। 

 

स्वयं को मध्यमवर्ग का बताती हैं। घर की बहू कहती हैं और बुजुर्गों से बेटी बनकर आशीर्वचन मांगती हैं। साथ ही जनता को याद भी दिलाती हैं कि मैं बालू माफिया और बालू माफिया नहीं हूँ, दादू भी नहीं हूँ। जनता से इस प्रकार से रूबरू होने का अंदाज मऊ - मानिकपुर के उपचुनाव में बड़ा असर छोड़ जाएगा। 

 

उन्होंने जनता से स्पष्ट कहा है कि स्त्री हूँ और स्त्री मन बड़ा संवेदनशील होता है। वो घर की रसोईं की समस्या को मन से समझती हैं। ऐसा वो महिलाओं से कहती हैं कि मुझे अहसास है कि बहनें किस प्रकार रसोईं के दर्द से जीवन मे अनेको बार गुजरती हैं। एक - एक पैसे से रसोईं का बजट बनता है। ऊपर से एक महिला का दर्द सुनने वाला जनप्रतिनिधि नहीं बन पाता। 

 

इस बात को लेकर वह महिलाओं के बीच में पहुंचती हैं। उनके आत्मसम्मान की बात करती हैं। घरेलू समस्या पर चर्चा करती हैं। गांव - गली के बच्चे उनके पास बिन कपड़ों के चले आते हैं , जैसे कोई उनके अपने घर की चाची हों, भाभी हों। यहाँ तक की एकाध बार कुछ बच्चे रंजना चाची आईं हैं, यह पुकारते हुए सुने गए। 

 

एक उम्मीदवार के तौर पर उनके प्रचार करने की यह कला आम जनता के मन में समाती जा रही है। सबसे बड़ी बात है कि वह आम लोगों के बीच में वास्तव में आम महिला की तरह मुलाकात करती हुई नजर आती हैं। वे अपने चुनावी क्षेत्र में खूब मेहनत करती हुई नजर आ रही हैं। यह सच है कि कांग्रेस प्रत्याशी कम दिनों में बड़ी चर्चा का विषय अवश्य बन चुकी हैं और उनका टाइटल " ना मैं बालू माफिया हूँ, ना भू माफिया हूँ " खूब प्रचारित हो रहा है।  

 

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