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बाहुबली विधायक अखिलेश सिंह का निधन, जानिए इनके बारे में

@सौरभ चन्द्र द्विवेदी, चित्रकूट 

रायबरेली से पांच बार के एमएलए अखिलेश सिंह नही रहे। यूपी की राजनीति ने ऐसा दबंग "रॉबिनहुड" पहले कभी नही देखा था। करीब 45 आपराधिक मुकदमों के बावजूद जनता का एक ऐसा बड़ा तबका था जो उन्हें बेइंतहा प्यार करता था। पिछले तीन दशक में अखिलेश सिंह जिधर उंगली दिखाते रहे, रायबरेली उधर ही देखती रही। क्या सोनिया गांधी, क्या राहुल और प्रियंका, कोई भी उनकी चुनौती के आगे खड़ा होने का साहस न कर सका। 

 

1993 से बतौर विधायक कांग्रेस से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करने वाले अखिलेश सिंह लगातार तीन बार कांग्रेस से रायबरेली के एमएलए रहे। एक विवाद के बाद उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी। साल 2007 और 2012 के दो चुनावों में लगातार गांधी परिवार ने उनकी हार को अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया। सोनिया गांधी और प्रियंका ने उन्हें हराने की खातिर घूम घूमकर वोट मांगे पर अखिलेश सिंह और भी ज़्यादा तेवर से उसी रायबरेली सीट से विजयी हुए। 2007 का चुनाव तो अद्भुत था। एक साल पहले यानि साल 2006 में रायबरेली सीट पर लोकसभा उपचुनाव हुए थे। सोनिया गांधी 80.4 फीसदी वोट लेकर रिकॉर्ड मतों से जीतीं थीं। मगर जब विधानसभा चुनाव हुए तो रायबरेली की पांच में से चार सीट कांग्रेस ले गयी पर रायबरेली सदर में अखिलेश सिंह फिर शान से जीत गए। वो भी गांधी परिवार का खुलेआम विरोध करके। रायबरेली की सांसद सोनिया गांधी मन मसोसकर रह गईं। अखिलेश सिंह के जलवे का आलम ये था कि कांग्रेसी रायबरेली सदर में अपना पोस्टर तक लगाने से डरते थे। जिस दिन रायबरेली में राहुल और प्रियंका की जनसभा होती, उसी रोज़ उनसे कुछ ही दूरी पर वे अपनी सभा करते और दूनी भीड़ जुटा लेते थे।

 

आखिर कांग्रेस ने उनके आगे समर्पण कर दिया। 2016 में उन्हें पार्टी में वापिस बुलाया गया और उनकी बेटी अदिति सिंह को उसी सीट से टिकट दिया गया। इस बार अखिलेश सिंह की छत्रछाया में अदिति सिंह चुनाव जीतीं। तमाम आपराधिक रिकार्ड्स और विवादों के बावजूद अखिलेश सिंह के बारे में एक बात हमेशा मशहूर रही कि ज़रूरतमंदों के लिए उनके दरवाजे हमेशा खुले रहे। यूपी की राजनीति अखिलेश सिंह को धारा के विपरीत तैरने की दुर्लभ ताकत के लिए हमेशा याद रखेगी।

  

(साभार फेसबुक ) 

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