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हर साल सिगरेट के धुएं में उड़ती है 70 लाख लोगों की जिंदगी

सबसे अधिक होने वाला कैंसर मुंह में होने वाला कैंसर (ओरल कैंसर)है। इसका कारण यह है कि इस महाद्वीप के निवासी तंबाकू का किसी न किसी रूप में अत्यधिक सेवन करते हैं। गुटखा, पान-मसाला, खैनी आदि तंबाकू उत्पादों का सेवन यहां के तमाम लोगों की आदतों में शुमार हो गया है। तंबाकू, पान-मसाला और गुटखा के खिलाफ चले अनेक अभियानों के बावजूद तमाम लोगों की तम्बाकू की लत कुछ थमी जरूर है, पर इससे छुटकारा नहीं मिल सका है।

कैंसर क्या है

सहज शब्दों में कहें, तो कैंसर शरीर में कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि का एक समूह है। कैंसर शरीर के अंग विशेष से अन्य भागों में भी फैल सकता है। अगर शरीर में तेजी से बढ़ने वाली कोई गांठ हैं, तो वह कैंसर हो सकती है। वहीं जो गांठ तेजी से नहीं बढ़ती, उसमें कैंसर होने की आशंका कम होती है। मस्तिष्क में तेजी से बढ़ने वाली गांठें ट्यूमर कहलाती हैं। ध्यान दें कि हर गांठ कैंसर नहीं होती।

प्री-कैंसर स्टेज पर दें ध्यान

मुख कैंसर की चिंता प्री कैंसर स्टेज(कैंसर शुरू होने से पहले की अवस्था) में ही करनी चाहिए। यदि व्यक्ति विशेष का मुख दांतों के बीच चार सेंटीमीटर से कम खुल रहा है, मुख में भूरे, सफेद या लाल चकत्ते हैं और या फिर कोई ऐसा घाव है, जो ठीक नहीं हो रहा है, तो कैंसर विशेषज्ञ का परामर्श जान बचाने वाला हो सकता है। अब प्री कैंसर अवस्था में उपचार देकर कैंसर की रोकथाम संभव है।

क्या है इलाज

मुख कैंसर के उपचार में विकिरण चिकित्सा, कीमोथेरेपी और सर्जरी सर्वमान्य उपचार पद्धतियां हैं। इन तीनों विधियों में आधुनिक तकनीकों ने क्रांतिकारी बदलाव किया है और उपचार को कुछ हद तक कम से कम तकलीफ वाला बना दिया है। ब्रैकीथेरेपी, आई.एम.आर.टी और टारगेटेड थेरेपी ने बहुत से रोगियों को सर्जरी से भी निजात दिलवा दी है।

शुरुआती अवस्था में इलाज

वस्तुत: मुख कैंसर रातों-रात नहीं पनपता। तंबाकू, गुटखा और पान मसाले के सेवन से धीरे-धीरे हमारी मुख कोशिकाओं में तमाम परिवर्तन होते हैं, जो आदतों के बने रहने के चलते कालांतर में कैंसर पैदा करते हैं। मुख कैंसर पनपने में लगभग दस से पंद्रह वर्ष लगते हैं। सबसे पहले मुख कैंसर की पूर्वावस्था 'डिसप्लेजिया' के रूप में सामने आती है। इसके बाद यह स्थिति विभिन्न 'ग्रेड्स' से गुजरती हुई कैंसर बन जाती है।

वर्तमान में 'डिसप्लेजिया' के स्तर पर कैंसर को पनपने से रोकने के तमाम प्रयास जारी हैं। जैसे कुछ दवाएं अगर डिसप्लेजिया के स्तर पर दी जाती हैं, तो कैंसर बनने की प्रक्रिया न केवल थमने लगती है, अपितु 'बैक-गियर' में जाने लगती है। 'वाष्पीकरण लेजर' के द्वारा भी डिसप्लेजिया को जड़ से समाप्त करके कैंसर को होने से रोका जा सकता है। 

 

 

अन्य विकल्प

रेडिएशन थेरेपी और कीमोथेरेपी के समन्वित प्रयोग से बढ़ी हुई गंभीर अवस्था वाले रोगी भी अब ठीक हो रहे हैं। आई.एम.आर.टी. और ब्रेकीथेरेपी की नई रेडिएशन तकनीकों ने तमाम कैंसर रोगियों को पूर्ण-स्वास्थ्य लाभ दिया है।

फेफड़ों का कैंसर

तंबाकू उत्पादों का शरीर पर बेहद बुरा प्रभाव पड़ता है। फेफड़े के कैंसर का मुख्य कारण धूमपान ही है। तंबाकू के धुएं में निकोटिन व कार्बन मोनो आक्साइड आदि नुकसानदेह गैसें मौजूद रहती हैं। इस कारण हमारे शरीर पर बुरा असर पड़ता है। फेफड़े हमें सांस लेने में सहायता करते हैं। वे शरीर की सभी कोशिकाओं को ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। कैंसर कोशिकाएं असामान्य कोशिकाएं होती हैं। कैंसर की कोशिकाएं स्वस्थ कोशिकाओं के मुकाबले अधिक तेजी से पैदा होती हैं और बढ़ती हैं। फेफड़ों का कैंसर तब होता है, जब फेफड़े की कोशिकाएं परिवर्तित होकर असामान्य हो जाती हैं। वे रक्त या लसीका (लिम्फ) के माध्यम से शरीर के अन्य अंगों तक फैल सकती हैं जिसे मेटास्टैसिस या कैंसर का फैलना कहते हैं।

कैंसर के कारण

1. फेफड़ों के कैंसर का एक प्रमुख कारण तंबाकू उत्पादों का सेवन करना है। बीड़ी व सिगरेट पीना फेफड़ों के कैंसर का सबसे मुख्य कारण है। धूमपान करने वालों में फेफड़ों के कैंसर का खतरा धूमपान न करने वाले लोगों की तुलना में 10 गुना ज्यादा बढ़ जाता है।

2. वायु प्रदूषण के संपर्क में आना।

3. कुछ विशेष धातुओं के संपर्क में आना जैसे क्रोमियम, कैडमियम और आर्सेनिक।

4. वंशानुगत जीन संरचना।

बात रोकथाम की

फेफड़े के कैंसर का बचाव प्रमुख रूप से धूमपान छोड़ने से संभव है। धूमपान बंद करने से लगभग 15 वर्ष बाद मरीज के फेफड़े में हुए धूमपान से संबंधित दुष्प्रभावों को खत्म किया जा सकता है। इस स्थिति में फेफड़ों के कैंसर होने का खतरा भी लगभग खत्म हो जाता है।

इलाज

फेफड़े के कैंसर के इलाज में सर्जरी, कीमोथेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और रेडियोथेरेपी से इलाज किया जाता है। रेडियोथेरेपी के अंतर्गत साइबर नाइफ एक आधुनिकतम तकनीक है, जिसके प्रयोग से बेहोश किए बगैर विभिन्न प्रकार के कैंसर की डायग्नोसिस व इलाज संभव है। दूसरे शब्दों में कहें तो साइबर नाइफ रेडियो सर्जरी का एक अत्यंत कारगर 'टारगेट सिस्टम' है, जिसमें रोगी के शरीर के प्रभावित अंग पर सर्जरी किए बगैर कैंसर का इलाज संभव है।

धूमपान का दिल पर बुरा असर

हार्ट अटैक पड़ने का एक प्रमुख कारण धूमपान है। जागरूकता के अभाव में अनेक लोगों में यह गलत धारणा व्याप्त है कि धूमपान से सबसे पहले फेफड़ों पर खराब असर पड़ता है और फेफड़े संबंधी बीमारी होने का खतरा बढ़ जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि धूमपान से हार्ट अटैक का खतरा कहीं ज्यादा बढ़ जाता है।

पैसिव स्मोकिंग भी खतरनाक

आपने देखा होगा कि कुछ लोग खुद धूम्रपान नहीं करते, लेकिन वे धूम्रपान करने वाले व्यक्ति के पास खड़े रहते हैं। जब धूमपान करने वाला धुआं छोड़ता है, तो पास में खड़े व्यक्ति के न चाहने के बावजूद, वह धुआं उसकी नाक और सांस नली के जरिए उसके फेफड़ों में चला जाता है। यही पैसिव स्मोकिंग है,जो धूम्रपान करने वाले व्यक्ति की तुलना में इसे न करने वाले व्यक्ति को कहीं अधिक नुकसान पहुंचाती है।

 

धमनियों की समस्या

धूमपान से हृदय, मस्तिष्क और पैरों आदि की धमनियों पर खराब असर पड़ता है। धूमपान से नुकसानदेह केमिकल्स निकलते हैं, जिनके कारण धमनियों की पर्त(लेयर) क्षतिग्रस्त हो जाती है। इस कारण कालांतर में धमनियां संकरी हो जाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप हार्ट अटैक और स्ट्रोक होने का खतरा बढ़ जाता है।

प्लाक या अवरोध की समस्या

धूमपान के कारण धमनियों में प्लाक या अवरोध उत्पन्न हो जाते हैं, लेकिन समय रहते धूमपान छोड़ देने पर यह समस्या स्वत: धीरे-धीरे कम होती जाती है। प्लाक को कम करने में स्टैटिन नामक दवा भी सहायक है।

धूमपान और काउंसलिंग

हालांकि धूमपान छुड़ाने वाली दवा भी उपलब्ध है। इसके लिए धूम्रपान करने वालों को डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। धूमपान छोड़ने में क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट काउंसलिंग भी करते हैं।

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