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एक दूसरे की दावेदारी ने गठबंधन की मुश्किल बढ़ाई

निर्वाचन आयोग द्वारा अधिसूचना जारी होते ही चुनाव की रणभेरी बज चुकी है, लेकिन प्रत्याशी के चयन में सभी दल फिसड्डी साबित हो रहे है। वहीं बसपा-सपा गठबंधन में अभी भी बुन्देलखण्ड की चार सीटों में उठा पटक होने से तस्वीर साफ नही हो पा रही है। 

प्रदेश में बसपा और सपा मिलकर 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर चुकी है। इस तरह 80 में से 76 सीटों पर दोनों पार्टियां चुनाव लड़ेगी चार सीटे अन्य दलों यानि रालोद व कांग्रेस के लिये छोड़ी गई है। बुन्देलखण्ड में लोकसभा की चार सीटे है। सैद्धान्तिक गठबंधन होने के बाद भी व्यवहारिक स्तर पर सीटों के बंटवारे को लेकर पेंच फंसा हुआ है।

मामला रनर और विनर का है। गठबंधन के प्रत्याशी अपना-अपना तक देकर अपनी जीत पक्की बताकर अपनी पार्टी के टिकट की वकालत कर रहे है। वहीं बसपा से जुड़े प्रत्याशी सजातीय मतो के सहारे अपनी नैया पार लगाने का दावा कर रहे है। झांसी सीट पर बसपा रनर और सपा तीसरे स्थान पर थी।

सामान्य रूप से पार्टी स्तर पर सीट बंटवारे का जो फार्मूला तय हुआ है उसके अनुसार 2014 के चुनाव में दूसरे स्थान पर रही पार्टी को ही सीट मिलेगी। इस हिसाब से तो झांसी ललितपुर सीट सपा और बांदा की सीट बसपा के खाते में जाना चाहिये। बांदा में बसपा रनर थी लेकिन बांदा की सीट सपा को दी जा रही है।

कमोवेश यही स्थिति महोबा, हमीरपुर-तिंदवारी संसदीय सीट का है। यहां पहले ही बसपा ने दावा कर रखा है जबकि इस सीट की रनर सपा है। यहां बसपा ने दिलीप कुमार सिंह को प्रत्याशी घोषित किया था। बाद मेें पार्टी ने एैन मौके पर प्रत्याशी बदलकर संजय साहू को चुनाव मैदान में उतार दिया।

जिससे पार्टी के एक बड़े खेमें में पार्टी नेतृत्व के खिलाफ नाराजगी बढ़ रही है। कुल मिलाकर देखा जाये तो यहां के नेताओं की महत्वकांक्षा और चुनाव में जीत की उम्मीदों ने पार्टी  हाईकमान की मुश्किलें बढ़ा दी है। दोनो ही दलों के नेता अपने अपने पार्टी आला कमान को यह विश्वास दिलाने की कोशिश में जुटे है कि अगर अपनी पार्टी को सीट मिलती है तो जीत पक्की है।

इस  तरह रोज रोज दावेदारी से सीटों का बंटवारा अभी भी अधर में लटका हुआ है। अगर जल्दी ही पार्टी के टिकट वितरण नही करती है तो आगामी चुनाव में पार्टी को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।

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