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बुआ भतीजे का साथ क्या भाजपा को देगा झटका ? 

बीजेपी एक तरफ वर्ष २०१९ के लोकसभा के आम चुनाव का शंखनाद कर रही कर रही थी तभी सियासत के सबसे बड़े दो दुश्मन यूपी में दोस्ती का हाथ मिला रहे थे। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच लोकसभा चुनाव के लिए गठबंधन हो रहा है। संभावना है कि आज सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा प्रमुख मायावती एक साझा प्रेस कोन्फ़्रेंस में इसका औपचारिक ऐलान भी कर दें। इससे भाजपा के अंदर खलबली मच गई है। 

लोकसभा चुनाव में यूपी में से ७३ सीटें जीतने वाली बीजेपी को भी अच्छी तरह से मालूम है कि दिल्ली का रास्ता यूपी से होकर ही जाता है। पिछले दिनों मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्वाचन क्षेत्र गोरखपुर और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के निर्वाचन क्षेत्र फूलपुर में बुआ भतीजे के गठबंधन से भाजपा की करारी हार हो चुकी है।

अब आगामी चुनाव में बुआ भतीजे साथ साथ आने की खबर से भाजपा को जोर का सियासी झटका लग चुका है। आम चुनाव में बुआ भतीजे का संग भाजपा को खटक रहा है। यह बात अलहदा है कि कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष गठबंधन को ढकोसला बता रहे हैं और कार्यकर्ताओं में उम्मीद की किरण भरने के लिए मोदी की लोकप्रियता का बखान कर रहे हैंं। 

यह गठबंधन राष्ट्रीय परिपेक्ष में किस रूप में सामने आएगा यह भविष्य के गर्भ में है। कांग्रेस विचारधारा के लोगों का मानना है कि २०१९ का आम चुनाव मोदी बनाम राहुल के चेहरे पर ही होगा, लेकिन यह बड़ा सवाल है कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के रूप में सर्वमान्य नेता मानने के लिए अन्य सियासी दल तैयार होंगे या नहीं। क्योंकि प्रधानमंत्री की कुर्सी का ख्वाब देखने वालों में राहुल गांधी के अलावा मायावती, अखिलेश यादव ,ममता बनर्जी, शरद पवार, चंद्रबाबू नायडू जैसे नेता शामिल हैं। क्या २०१९ की लोकसभा मे बहुमत का अभाव होगा और सबसे बड़ी पार्टी के नेतृत्व में सरकार बनाने खींचतान होगी। फिर वही सवाल पैदा होगा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा। 

सत्तारूढ़ दल के सामने नोटबंदी और जीएसटी जैसी मुद्दे चुनौती के रूप में हैं। दरसल इनसे व्यापारियों और बेरोजागरों में आक्रोश है। इसका प्रतिफल हालही में ३ राज्य मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा भुगत चुकी है। लिहाजा राष्ट्रीय स्तर पर भी इससे नुकसान होने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

पिछले चुनाव के मुकाबले इस बार उसे कम सीटें ही मिलेंगे ऐसा राजनीतिक पंडितों का मानना है। बहरहाल इसी साल मई में होने वाले चुनाव को लेकर जहां भाजपा शंखनाद कर चुकी है, वहीं उसके सहयोगी दल शिवसेना अपना दल और पासवान की आरएलडी आंखें तरेर रहे हैं। अपने सहयोगियों को साथ में रखना भी भाजपा के लिए एक चुनौती भरा काम है।

विपक्षी गठबंधन भाजपा को हराने के लिए साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपना रही है। इस स्थिति से निपटने के लिए भाजपा को भी अपने सहयोगियों को मजबूती के साथ अपने पास रखना होगा और उनकी शर्तों को मानने के लिए विवश होना पड़ेगा, वरना चुनाव नतीजे एक बार फिर भाजपा को झटका दे सकते हैं।

इस बात की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि अब केंद्र में किसी के भी नेतृत्व में बनने वाली सरकार गठबंधन की ही होगी। यहां बता दें कि २०१४ में भाजपा स्पष्ट बहुमत के साथ केंद्र में सत्ता में आई थी, लेकिन उसने अपने गठबंधन का धर्म निभाते हुए सहयोगी दलों को सत्ता में शामिल किया था।
 

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