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इंसान के रूप में फरिश्ते जैसे कार्य

कुछ ऐसे समाजसेवी व्यक्तित्व हैं , जो समाज की भलाई के लिए किए गए मदद के कार्यों का स्वमुख से गुणगान नहीं करते हैं और ना चर्चा पसंद करते हैं। बल्कि बड़े सधे तरीके से जरूरमंद की मदद कर आत्मीय सुख महसूस कर लेते हैं। एक ऐसा ही व्यक्तित्व जनपद चित्रकूट की भूमि से स्तंभ की भांति परोपकार के कार्यों हेतु खड़ा है। जिनका जीवन अध्ययन किया जाना आवश्यक है। उनके द्वारा किए गए कार्य अगर समाज के सामने आ जाएं तो तमाम पूंजीपति के लिए प्रेरक सिद्ध होगें कि धन का सदुपयोग किस प्रकार किया जाता है। अगर ईश्वरीय कृपा से धन की ताकत मिली है तो मानवीय कार्यों में मदद करने से धन खत्म नहीं होता बल्कि समाज की कृतज्ञता के साथ धन में वृद्धि भी होती है। ऐसी सोच से ही कुछ समाजसेवी अंदरखाने से गरीब और मजबूर लोगों की मदद कर , शिक्षा और समाज के प्रत्येक क्षेत्र में मानवता की ज्योति प्रज्वलित कर रहे हैं।

ऐसे तो अनेक प्रकरण हैं , जिनमें अशोक दुबे संकट मोचक की तरह ईश्वरीय कृपा से फरिश्ता बन प्रकट हुए। मेरी आंखो देखी सर्वप्रथम पुणे से एक गरीब मजदूर का शव उत्तर प्रदेश के चित्रकूट भिजवाने के कार्य में एंबुलेंस का किराया वहन करना तथा परिवार को आर्थिक मदद प्रदान करना पहला कार्य था। जब इनके इर्द-गिर्द रहते हुए जीवन पर अध्ययन किया तो वर्ष भर में अनेको ऐसे कार्य दिखे , जहाँ दिल खोलकर मददगार बने दिखे।

किन्तु एक हालिया मामला व्हाट्सएप का है , यह वही व्हाट्सएप है जिसको आए दिन फेक न्यूज व हिंसा भड़काने हेतु प्रयोग करने के लिए कोसा जाता है। किन्तु यह इंसान पर ही निर्भर है कि व्हाट्सएप का सदुपयोग कैसे होगा और हमारी व्हाट्सएप युनिवर्सिटी समाज के लिए क्या योगदान करेगी ? सोशल मीडिया के सदुपयोग का नायाब उदाहरण सरकार और समाज के लिए प्रेरक सिद्ध होगा और सोच बदलनी होगी कि कुछ अराजक तत्व हर क्षेत्र में सक्रिय होते हैं तो वहीं व्हाट्सएप पर कुछ ऐसे समूह भी हैं , जो दूर दराज क्षेत्र में रहते हुए सामाजिक चिंतन और मदद के कार्य में सहभागिता निभा रहे हैं।

निश्चित तौर पर बुंदेलखण्ड चाइल्ड वायस नाम से बने ग्रुप पर दीपक श्रीवास्तव ने जब एक लड़की के मजबूर पिता का खत साझा किया और यह बताया कि विश्वविद्यालय की शुल्क ना दे पाने से बेटी की शिक्षा रूक जाएगी , तब कुछ और हाथ तो मदद के लिए प्रकट हुए। परंतु हमेशा की तरह अशोक दुबे ने कह दिया कि मैं पूरी मदद करूंगा। चूंकि कुछ मदद चित्रकूट के सीए विश्वकर्मा ने कर दिया तो शेष बची बड़ी धनराशि को पुणे से ही एकाउंट में ट्रांसफर कर बेटी की शिक्षा ज्योति को अखंड स्वरूप प्रदान कर दिया। रितिका शर्मा की शिक्षा को लेकर धन की समस्या से जो अंधकार  व्याप्त हो रहा था , वह पल भर में कुहरे की भांति छंट सा गया। इनके कार्यों पर नजर दौड़ाएं तो शिक्षा की ज्योति को अखंड स्वरूप प्रदान करने में स्वयं के जन्मदिन पर स्कूली बच्चों को कांपी - किताब और सेनेटरी व कपड़े आदि बांटकर हमेशा से तत्पर रहें हैं। 

पिछले साल एक दिव्यांग बच्चे की शिक्षा के लिए भी बड़ा योगदान प्रदान किया था। यूं तो कहने के लिए सैकड़ो समाजसेवा के ऐसे कार्य हैं , जिनमें नि:स्वार्थ मदद कर जिंदगी बचाने का काम किया गया है। सच कहें तो ऐसे ही मनीषी प्रवृत्ति के लोगों से दुनिया में इंसानियत का वजूद कायम है और लोगों की उम्मीद पूरी होने का जरिया एक इंसान फरिश्ते के रूप में प्रकट हो जाता है। जब इंसान के अंदर मदद का भाव प्रबल होता है तब उसी के लिए जुबान से फरिश्ता शब्द स्वयं ही जन्म लेने लगता है। ऐसे व्यक्तित्व को ईश्वर सदैव सामर्थ्यवान बनाए रखे तो वास्तव में मजबूर और जरूरतमंद लोगों के लिए अंधेरे में दीपक का वह प्रकाश है , जिससे लोगों जिंदगी में प्रकाश फैल जाता है। 

कहावत है " जथा नाम तथा गुण " , सच है कि अपने नाम के अनुरूप लोगों के शोक को हर लेने वाले व्यक्तित्व के स्वामी अशोक दुबे समाज के लिए प्रेरक व्यक्तित्व हैं और बहुत से लोगों के लिए वह दर्पण के रूप में प्रस्तुत हैं , जो समाजसेवा को स्व लाभ से जोड़कर कलंकित कर रहे हैं। बातचीत के दौरान उनका कथन था कि अगर हर व्यक्ति अपने आस-पास थोड़ी थोड़ी मदद भी करता रहे तो हमारे समाज से बहुत सारी समस्याएं स्वयं खत्म हो जाएंगी और प्रत्येक जीवन में अपनत्व का भाव प्रबल होगा। जिससे हमारी भविष्य की पीढ़ियों को एक अच्छा समाज ही मिलेगा।

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