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देश को कहाँ ले जायेगी बेलगाम जनसंख्या

भारत आज जिन गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है उनमें प्रमुख हैं - गरीबी, कुपोषण, भ्रष्टाचार, सामाजिक और धार्मिक संघष्र तथा जनसंख्या में तेजी से वृद्धि। इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में विकास सम्बंधी जो सपने हमने देखें थे वे आबादी बढ़ने के साथ ही टूटते प्रतीत हो रहे हैं। हाल ही में सामने आये आंकड़ों से स्पष्ट हुआ है कि विश्व की वर्तमान जनसंख्या लगभग साढ़े सात अरब है और इसमें हर 14 महीनों में लगभग दस करोड़ लोग बढ़ रहे हैं। खास बात यह है कि भारत की जनसंख्या विश्व की जनसंख्या की 16.7 प्रतिशत है अर्थात्् विश्व का प्रत्येक छठवां व्यक्ति भारतीय है। भारत की जनसंख्या 1992 में 95.6 करोड़ से बढ़कर वर्ष 2015 में 1.28 अरब हो गई। बीस साल से कम समय में ही देश की जनसंख्या में 32.6 करोड़ की वृद्धि हुई। यह वृद्धि संयुक्त राज्य अमरीका की कुल जनसंख्या के बराबर है। वर्तमान में इसमें एक से सवा करोड़ व्यक्ति प्रति वर्ष की दर से बढ़ोत्तरी हो रही है।

देश में जनसंख्या वृद्धि की यही रतार रही तो सरकार को वर्ष 2020 तक बीस करोड़ लोगों के जीवनयापन की अतिरिक्त व्यवस्था करनी होगी। अनुमान है कि तब तक देश की जनसंख्या एक अरब चालीस करोड़ तक पहुँच जाएगी। विश्व में चीन और भारत दो ऐसे देश हैं, जिनकी जनसंख्या एक अरब के आंकड़े को पार कर चुकी है। अनुमान है कि 2030 तक भारत चीन को पीछे छोड़कर दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। तब इन दोनों देशों की अपनी-अपनी आबादी 1.5 अरब को पार कर जाएगी। इसके बाद भी भारत की आबादी बढ़ना जारी रहेगी और चीन की आबादी में गिरावट की संभावनाएं प्रबल होंगी।

दुनिया में बढ़ती आबादी का जो ग्राफ सामने आया है उसमें एक बड़ा कारण ग्रामीण आबादी का नगरों की तरफ तेजी से पलायन भी माना जा रहा है। आंकड़ों के अनुसार 18वीं शताब्दी में दुनिया की 3 फीसदी से भी कम आबादी नगरों में रहती थी परन्तु 21वीं शताब्दी तक आते-आते दुनिया की यह नगरीय आबादी बढ़कर 50 फीसदी तक पहुँच गई। आज दुनिया में एक करोड़ से भी अधिक की आबादी वाले लगभग 30 महानगर हो गए हैं। इनमें टोक्यो, शंघाई, मनीला, जकार्ता, ओसाका, करांची, ढाका और बीजिंग के साथ-साथ भारत के दिल्ली, मुम्बई और कोलकत्ता जैसे शहर प्रमुख हैं। दूसरे देशों के महानगरों को छोड़ दें लेकिन भारत के महानगरों की बढ़ती जनसंख्या का दुष्प्रभाव न केवल भारतीय अर्थव्यवस्था, रोजगार तथा लोगों के गुणात्मक जीवन तक ही सीमित है बल्कि इसके कारण प्रादेशिक असंतुलन भी गड़बड़ा रहा है।

मध्यप्रदेश की जनसंख्या अभी 7 करोड़ 50 लाख है जबकि छत्तीसगढ़ की 2 करोड़ 60 लाख, उत्तर  प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और पश्चिम बंगाल जनसंख्या के लिहाज से भारत के सबसे बड़े राज्य हैं। भारत के दक्षिणी राज्यों में इस मसले पर जागरूकता है और उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण पर समझदारी दिखाई है। उत्तर-पूर्वी और पहाड़ी राज्यों में भी स्थिति बेहतर है। ऐसे राज्यों को केन्द्र द्वारा हर तरह से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जिन राज्यों में जनसंख्या का ग्राफ ऊपर है वहाँ के शहरी और कस्बाई लोग, जो विकास के लिए प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए ज्यादा जिम्मेदार हैं, उनकी जनसंख्या तो तेजी से बढ़ रही है। परन्तु जनजातीय समुदाय, जो प्रकृति से पूरी तरह से तालमेल बनाकर रहते हैं, उनकी जनसंख्या तेजी से घट रही है। उनमें से कुछ तो विलुप्ति की कगार पर हैं।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में जनसंख्या की स्थिति को लेकर भारत के लिए जो आंकलन किया गया है वह हमारे लिए खतरे की घंटी है। हमें सचेत हो जाना चाहिए। जनसंख्या की वृद्धि देश का विकास तो रोकती ही है साथ ही यह पूरी आबादी के लिए जरूरत के संसाधनों में कमी भी करती है। बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आवश्यकता है। प्राथमिक स्वास्थ्य और प्रजनन सम्बंधी नीतियों में सुधार कर अनचाहे गर्भ के मामलों में कमी लानी होगी। परिवार नियोजन के बारे में जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। परिवार नियोजन के साधनों की उपलब्धता हर स्थान पर नि:शुल्क करनी होगी। इसके अलावा ग्रामीण तथा शहरी क्षेत्रों में विकास का संतुलन बनाना होगा ताकि वहाँ की आबादी को शहरों का रुख न करना पड़े और शहरों पर दबाव कम रहे।

स्कूलों में यौन एवं प्रजनन से सम्बन्धित शिक्षा प्रारम्भ करने की नितांत आवश्यकता है ताकि विद्यार्थी जब वैवाहिक जीवन में प्रवेश करें तब वे ”प्रजनन अनुशासन“ का पालन कर सकें जिससे सीमित परिवार को बल मिलेगा और जनसंख्या नियंत्रित होगी। ध्यान रहे कि बढ़ती जनसंख्या के खतरे को जब तक हम गंभीरता से नहीं लेंगे तब तक कोई भी उपाय, सरकारी पहल और रिपोर्टों में दी गयी चेतावनी असर नहीं दिखायेगी। अब भी समय है। हम बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणामों को समझें और उस पर अमल करें।

किसी एक व्यक्ति या समुदाय पर जनसंख्या नियंत्रित करने का दबाव बना देने भर से न तो समस्या खत्म होगी और न ही हम देश को आबादी के बोझ से छुटकारा दिला पाएंगे। विश्व जनसंख्या दिवस पर बड़ी-बड़ी बातें कर लेने भर से भी कुछ हासिल नहीं कर सकते। जीवन में आने वाली कई समस्याओं के लिए हम भले ही जिम्मेदार न हों, मगर जनसंख्या नियंत्रित करना हमारे ही हाथ में है। इस दिशा में सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों में हम वैसे ही साथ दें, जैसा दूसरे कामों में देते हैं। वरना हम जो गलती कर रहे हैं, उसका परिणाम हमारी आने वाली पीढ़ी भुगतेगी। शायद उस समय हम उसकी परेशानी को देखने के लिए जीवित ही न बचें।

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