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राहुल के लिए चुनौती है महागठबंधन की राजनीति

यह बात तो लगभग सभी विचारकों, विशेषज्ञों व राजनीतिज्ञों ने तमाम तथ्यों के साथ रख दी है कि यदि कांग्रेस को लोकसभा चुनाव 2019 रुपी वैतरणी पार करनी है तो उसे पार्टी संगठन ही नहीं बल्कि गठबंधन रुपी नाव को भी एकजुटता के साथ ही खेना होगा। बगैर लय-ताल के विपरीत गामी लहरों को काट पाना पतवारों के वश की भी बात नहीं होती है। इस प्रकार अलग-अलग चलते हुए विरोधियों को मात नहीं दी जा सकती है। इस बात को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी भी अच्छी तरह जान चुके हैं।

यही वजह है कि उन्होंने पिछले दिनों हुए उप चुनाव के दौरान गठबंधन वाले दलों के साथ नम्रता बरतने का काम किया और साझा कार्यक्रम चलाने जैसे सुबूत भी पेश किए। पार्टी को इसका फायदा भी हुआ। इसके साथ ही राहुल ने तमाम सहयोगी दलों को एकजुट होने की सलाह देने जैसा काम भी किया। दूसरी तरफ यहां महागठबंधन को लेकर अपनों के द्वारा ही बयानवाजी तेज हो चली है। इसे देखते हुए कहा जा रहा है कि भाजपा के खिलाफ विपक्ष को एकजुट करते हुए महागठबंधन बनाने में कांग्रेस को पार्टी के भीतर से ही चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इस मामले को पश्चिम बंगाल इकाई के असंतोष को जोड़कर देखा जा रहा है। फिलहाल देखा जाए तो पश्चिम बंगाल में कांग्रेस दो धड़ों में बटी नजर आती है। वैसे जानकारों की मानें तो यह लड़ाई स्थानीय नेतृत्व को लेकर लंबे समय से चली आ रही खींचतान का ही हिस्सा है।

बताया जा रहा है कि अब यह खींचतान बड़े पैमाने में गुटबाजी का रुप लेकर गठबंधन के विकल्पों को तलाशने तक पहुंच गया है। एक तरफ जहां पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल कांग्रेस का एक धड़ा विपक्षी वाम मोर्चा के साथ गठबंधन की वकालत कर रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस सचिव और स्थानीय विधायक मैनुल हक के नेतृत्व वाला एक अन्य गुट सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए समर्थन जुटाने में लगा हुआ है। कुछ समर्थकों के पाला बदलने और तृणमूल के साथ जाने की अटकलों के बीच कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने खुद भी राज्य के तमाम नेताओं से व्यक्तिगत रुप से मुलाकात कर जतला दिया कि इस मामले में वो गंभीर हैं और किसी को भी पार्टी व गठबंधन की एकजुटता के साथ खिलवाड़ करने नहीं देंगे।

यही वजह है कि राहुल से मुलाकात के बाद मैनुल हक को कहना पड़ा था कि वो कांग्रेस नहीं छोड़ेंगे और किसी भी फैसले से पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के निर्णय का वो इंतजार करेंगे। यहां गुटों में बटी कांग्रेस को मजबूत करने के नाम पर अपना वर्चस्व दिखाने की कोशिश करते नेताओं को याद दिलाने की आवश्यकता है कि जब तक वो खुद एकजुट नहीं होंगे तब तक पार्टी मजबूत नहीं हो सकती है। स्थानीय घटनाक्रमों को देखते हुए पार्टी वर्चस्व और नेताओं की पकड़ पर विचार जरुर किया जाना चाहिए, लेकिन मतभेद होने पर पार्टी को कमजोर करने वाले कदम उठाना किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है, लेकिन पश्चिम बंगाल में ऐसा होते हुए देखा जा रहा है। इसलिए कहा जा रहा है कि तमाम नेताओं को पार्टी गाइडलाइन में लाने का काम भी अब राहुल को ही करना है। इस प्रकार अपनों को मनाने और असंतुष्ट नेताओं को संतुष्ट करने जैसी चुनौती भी राहुल के सामने है।

ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि पश्चिम बंगाल ही नहीं बल्कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे हिन्दी वेल्ट के राज्यों के अलावा खुद दिल्ली में भी विभिन्न गुटों के प्रभावी होने के संकेत मिल रहे हैं, जो कि पार्टी को अंदरुनी तौर पर कमजोर करने में लगे हुए हैं। कांग्रेस की दिल्ली इकाई की बात करें तो मालूम चलता है कि पार्टी के प्रदेश नेतृत्व ने अरविंद केजरीवाल नीत आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन करने से साफ मना कर दिया है, जबकि इस मामले में खुद राहुल गांधी अभी मौन साधे हुए हैं। इस वजह से दिल्ली में भी दो खेमों में कांग्रेस बटती दिख रही है। कुछ इसी तरह का मामला कांग्रेस शासित पंजाब प्रांत का भी है। यहां भी राज्य नेतृत्व आम आदमी पार्टी के साथ किसी भी तरह के गठबंधन के खिलाफ है, लेकिन शीर्ष नेतृत्व इस बारे में क्या सोचता है फिलवक्त स्पष्ट नहीं हो सका है। इस प्रकार जहां से फैसले होने चाहिए वहां खामोशी का माहौल है और जिन्हें बताए गए रास्ते पर चलना है वो लगातार जल्दवाजी में फैसले लिए चले जा रहे हैं।

इसका खामियाजा भी पार्टी को ही भुगतना है। राजस्थान और मध्य प्रदेश में कांग्रेस की गुटबाजी पहले से सुर्खियां बटोरती रही है, बावजूद इसके कांग्रेस और बसपा के साथ गठबंधन करने के प्रयास तेज कर दिए गए हैं। इस गठबंधन का मूल कारण भाजपा विरोधी वोटों को बिखरने से रोकना है। बहरहाल यहां पर भी शीर्ष नेतृत्व से स्पष्ट निर्णय की दरकार है, क्योंकि प्रदेश नेतृत्व की बात केंद्र से जब कटती है तो उस पर से लोगों का भरोसा उठता है। अंतत: गुटों में बंटे कांग्रेस नेताओं को चाहिए कि वो अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष का हाथ मजबूत करने के लिए तमाम मतभेदों को भुलाकर एकजुटता का सुबूत पेश करें।

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