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कर्मचारियों के लिए डोप टेस्ट तो फिर नेताओं के लिए क्यों नहीं

पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह को मानों यह आभास हो गया है कि यदि प्रजा गलत रास्ते पर जाती है, वह दु:ख उठाती है और उसे सदा कष्टों का सामना करते हुए जीवन-यापन करना पड़ता है तो इसकी सजा ईश्वर उस राज्य के 'राजा' को ही देगा। यही वजह है कि  पंजाब के मुखिया अमरिंदर सिंह ने जहां नशे के कारोबारियों को मौत की सजा देने का प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजा वहीं अब वो कह रहे हैं कि राज्य के तमाम सरकारी कर्मचारियों को 'डोप टेस्ट' से गुजरना होगा।

मतलब पूर्ण शराबबंदी की ओर प्रदेश को ले जाने की कोशिश वो करते देखे जा रहे हैं। इस मामले को असमय होती मौंतों के साथ ही साथ प्रजा की खुशहाली से जोड़कर देखा जा रहा है। इसलिए खासतौर पर मुझे इस समय रामचरित मानस के रचैयता गोस्वामी तुलसीदास बहुत याद आ रहे हैं। दरअसल तुलसीदास कृत रामचरित मानस की चौपाई में कहा गया है कि ''हहु करहु सब कर परितोषू। नतरु तात होइहि बड़ दोषू॥ जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृपु अवसि नरक अधिकारी॥'' अर्थात् हे तात तुम यहीं रहो और सबमें संतोष करते रहो। नहीं तो, हे तात! बड़ा दोष होगा। जिसके राज्य में प्यारी प्रजा दुःखी रहती है, वह राजा अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है।

इस चौपाई को पढ़ने और समझने के बाद यह ख्याल भी आता है कि तुलसीदास ने तो यह हिदायत राजाओं को दी थी, क्योंकि तब राजतंत्र जो था। अब भारत में राजतंत्र या राजशाही थोड़े ही है, अब तो हम लोकतांत्रिक व्यवस्था में हैं। जहां राजा प्रधानसेबक के अलावा कुछ भी नहीं,  जो भी है प्रजा ही है। मतलब जस प्रजा तस राजा, वाली व्यवस्था में आखिर मुखिया पर दोषारोपण कैसे लगाया जा सकता है। जब देश का असली मालिक आमजन है और वही अपना सेवक चुनती है तो उसके अच्छे या बुरे होने की जिम्मेदारी भी उसे ही उठानी चाहिए। इस समय वाकई यह तो बड़ा कठिन सवाल हो गया है कि दोष किस पर मढ़ा जाए, शराब पीने वालों पर या शराब पर पाबंदी लगाने वालों पर। बहरहाल बात समझ में आ गई कि लोग चाहते हैं कि गुजरात और बिहार की तरह शराब पर पूर्ण पाबंदी लगाने की बजाय शराब के नुक्सानात जनता को बतलाए जाएं, ताकि वो खुद ही इससे दूरी बनाएं और अपना-अच्छा बुरा भी जानें। वैसे इस समय हिंदुस्तान में जो हो रहा है वह वाकई बहुत ही तकलीफदेह और चिंतनीय है। मासूम बच्चियों के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्याएं लगातार दिल को जख्मी किए हुए हैं।

भीड़ द्वारा बच्चा चोरी के नाम पर तो कभी गाय के नाम पर हत्याएं की जा रही हैं, मानों पुलिस और न्यायालय से लोगों का भरोसा ही उठता चला जा रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो कोई क्योंकर जानबूझकर कानून को अपने हाथों में लेते हुए खुद अपराधी बन जाता। आखिर क्या वजह है कि आपसी बातचीत और अदालतों में अपने मामले निपटाने की बजाय लोग सार्वजनिक तौर पर हत्या जैसा जघन्य अपराध कर सदा के लिए मामले निपटाने की राह को आसान और सही समझने लगे हैं।

मानों हम वाकई उस कलयुग के अति मलीन समय में प्रवेश कर चुके हैं जहां इंसान ही इंसान का सबसे बड़ा दुश्मन बन बैठा है। बहरहाल यहां हम बात चूंकि पंजाब प्रांत की कर रहे हैं जहां के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली पंजाब सरकार ने पहले तो केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा कि नशे के कारोबारियों को मौत की सजा दी जाए और उसके एक दिन बाद ही मुख्यमंत्री ने कैबिनेट की बैठक बुलवाई, करीब पांच घंटे लंबी बैठक चली और अनेक सख्त फैसले भी ले लिए गए। इसके बाद खबरों में आया कि मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने आदेश दिया है कि सभी राज्य कर्मचारियों जिसमें पुलिसकर्मी भी शामिल होंगे उन्हें अपना डोप टेस्ट करवाना अनिवार्य होगा। खास बात यह है कि अब यह डोप ​टेस्ट कर्मचारी नियुक्ति के समय भी किया जाएगा, चाहे वह किसी भी स्तर की सेवा के लिए क्यों न नियुक्त किए जा रहे हों। यहां मुख्यमंत्री ने मुख्य सचिव को आदेश दिया वहां इस पर प्रतिक्रियाएं आना शुरु हो गईं।

सरकार कहती है कि नशे के कारण प्रदेश में मौतों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि को देखते हुए यह फैसला लेना पड़ रहा है, जबकि इसके खिलाफ बोलने वाले कह रहे हैं कि यदि नशाबंदी करना ही है तो पहले सरकार अपने मंत्रियों, विधायकों यहां तक कि परिजनों और सगे संबंधियों से शराब और अन्य नशा छुड़वाकर बतलाए, उसके बाद आमजन को इस मामले में आंख दिखाने का काम करे। बात सही भी है, क्योंकि जैसा दूसरों के लिए आप चाहते हैं वैसा ही खुद भी करके पहले देखिए। इसमें क्या भलाई है और क्या बुराई इसका भी पता चल जाएगा, लेकिन चूंकि मामला जनहित से जुड़ा हुआ है और सरकार खुद अपना आर्थिक नुक्सान करके शराबबंदी करने को आगे बढ़ रही है तो उसका साथ दिया जाना चाहिए। जहां तक सरकार के नुमाइंदों या विधानसभा सदस्यों के डोप टेस्ट जैसी बात है तो उसका पालन विधानसभा अध्यक्ष खुद भी करवा सकते हैं, क्योंकि सदन चलाने की विशेष जिम्मेदारी उनके कंधों पर होती है, ऐसे में वो बेहतर जानते हैं कि सदन के सदस्य कैसे, क्या करेंगे।

इस संबंध में किस तरह और कैसे क्या करना है वो अच्छी तरह से जानते हैं, इसलिए प्रदेश सरकार जो करने जा रही है उसका स्वागत किया जाना चाहिए और कोशिश की जानी चाहिए कि इसके जरिए वो शासन-प्रशासन में सुसंस्कृति के साथ ही भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी को भी मिटाने में कामयाब रहेंगे। दरअसल सभी जानते हैं कि शराब का नशा तो उसके पीने के बाद ही होता है, जबकि पैसे और अन्य तरह के नशे इसके बगैर ही लोगों के सिर चढ़कर बोलते हैं, ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह अति सर्वत्र वर्जयेत को याद रखे और यूं ही अच्छे कदम उठाती चले।

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