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क्या अब दूर हो जाएंगी केजरीवाल सरकार की तमाम बाधाएं

देश को आजाद हुए सात दशक गुजर चुके हैं, लेकिन पहले कभी इस तरह का प्रश्न नहीं उठा था कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार के फैसलों को रोकने या उन्हें बदलने का अधिकार उप राज्यपाल को भी हो सकता है, पर अफसोस कि ऐसा हुआ है और वह भी हिन्दुस्तान के दिल कहे जाने वाले दिल्ली प्रदेश में। चूंकि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है अत: यहां प्रदेश सरकार के अधिकार सीमित हैं, लेकिन इसका यह अर्थ तो कतई नहीं लगाया जा सकता कि उसके काम-काज का निर्धारण खुद उप राज्यपाल करने लगें। दरअसल हमारे संविधान में कार्यपालिका, न्यायपालिका और व्यवस्थापिका के अपने-अपने कार्यक्षेत्र और अधिकार हैं। इन्हें किसी और के क्षेत्र या कार्य में दखल देने का अधिकार प्राप्त नहीं है। सभी स्वतंत्र रुप से अपने कार्यों को अंजाम दे सकती हैं, लेकिन जब कोई सीमाओं का उल्लंघन करता है तो उसके लिए संविधान में विशेषाधिकार भी उल्लेखित हैं। ऐसे ही फेसलों के अधिकार मामले को लेकर दिल्ली सरकार और एलजी के बीच में लंबी लड़ाई चली और मामला अदालत तक पहुंच गया। इसी मसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया।

अपने फैसले के जरिए अदालत ने साफ कर दिया कि दिल्ली के उप राज्यपाल के पास स्वतंत्र फैसले लेने का अधिकार नहीं है और उन्हें मंत्रिपरिषद के सहयोग और सलाह पर ही कार्य करना चाहिए। दरअसल इस फैसले से पहले देखने वालों ने देखा था कि दिल्ली की जनता द्वारा चुनी हुई आप सरकार हर काम एलजी की स्वीकृति से करने को बाध्य नजर आई। पग-पग में फैसले लेने के अधिकार को लेकर दोनों में खींचातानी चल रही थी। हद यह हो गई कि केजरीवाल सरकार को अपनी बात रखने के लिए उप राज्यपाल के बंगले में धरना तक देना पड़ गया, लेकिन उन्हें इस कदर नजरअंदाज किया गया कि यह घटना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक अलग परंपरा को शुरु करने वाली साबित होती दिखी। उनकी किसी को नहीं सुनना था सो किसी ने उनकी नहीं सुनी। इसके बाद मीडिया और विचारमंच ही नहीं बल्कि आमचर्चा का विषय यह हो गया कि आखिर लोकतंत्र में जब जनता सर्वोपरी है तो उसकी चुनी हुई सरकार को इस कदर लाचार कैसे किया जा सकता है कि छोटे से छोटे फैसले लेने के लिए भी किसी और का मुंह ताकना पड़े।

बहरहाल लोकतंत्र की मानों लाज बचाते हुए सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने यह फैसला दे दिया कि उप राज्यपाल की भूमिका अवरोधक की नहीं होनी चाहिए। गौरतलब है कि अदालत ने अपने फ़ैसले में कहा है कि 'मंत्रिपरिषद के सभी निर्णय उप राज्यपाल को बताए जाने चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी सहमति ज़रूरी है।' इसका अर्थ यही हुआ कि दिल्ली सरकार ने सदन में क्या फैसले लिए हैं उससे उप राज्यपाल को अवगत करा दिया जाए, न कि उन फैसलों के लागू करने से पहले स्वीकृति ली जाए। इस फैसले के बाद यह मान लिया जाना चाहिए कि यदि इसके बाद भी ऐसा कुछ होता है तो फिर इसे सरकार के कामों में हस्तक्षेप ही माना जाना चाहिए।

संविधान पीठ ने तो यहां तक कह दिया है कि 'निरंकुशता और अराजकता नहीं होनी चाहिए।' वैसे यह वाक्य दोनों पक्षों के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, क्योंकि निरंकुश सरकार भी कई बार गलत फैसला लेकर जनविरोधी और अहितकारी फैसले ले लेती है, इसलिए इस स्थिति से बचने के लिए ही यह आर्ष वाक्य रखा गया है। इसका दोनों को बराबर पालन करना होगा। बहरहाल दिल्ली मामले को समीक्षात्मक और करीबी नजर से देखने वालों  यह भी दिखाई दिया था कि उप राज्यपाल की भूमिका किसी निरंकुश शासक जैसी ही हो गई थी, क्योंकि उन्होंने सरकार के अनेक निर्णयों को यह कहते हुए न सिर्फ वापस किया बल्कि उन्हें खारिज भी कर दिया था कि यह प्रदेश सरकार के अधिकार सीमा में नहीं आता है।

यही वजह थी कि केजरीवाल सरकार लगातार कहती रही है कि उप राज्यपाल केंद्र की मोदी सरकार के कहने पर ऐसा कर रहे हैं, जबकि उनके पास इस तरह के फैसले लेने के अधिकार हैं ही नहीं। बावजूद इसके कि दिल्ली के एलजी बदले गए लेकिन मामला शांत नहीं हुआ और अंतत: अदालत को अहम फैसला देते हुए कहना पड़ा कि भूमि, क़ानून-व्यवस्था, पुलिस को छोड़कर दिल्ली सरकार के पास अन्य सभी विषयों पर क़ानून बनाने और उसे लागू करने के अधिकार हैं।

मतलब सीमाएं हैं, जिनका पालन केजरीवाल सरकार को करना ही होगा, लेकिन अब वह किसी पर आश्रित भी नहीं होगी। इस फैसले से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत अन्य मंत्रियों और विधायकों का मनोबल जरुर बढ़ा होगा, लेकिन उन्हें यह भी याद रखना होगा कि दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश है, इसलिए अन्य राज्यों के राज्यपालों की तरह उप राज्यपाल को अधिकारविहीन नहीं मान लें, उनसे मिलकर और सलाह-मश्विरा से ही सरकार चलाना होगा। इस फैसले से यह तो तय हो गया कि लोकतंत्र में जनता द्वारा चुनी हुई सरकार सुप्रीम है, लेकिन दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा भी तो मिलना चाहिए, ताकि अधिकार क्षेत्र बढ़े और काम करने में और आसानी पैदा हो। वैसे पूर्ण राज्य की मांग केजरीवाल सरकार शुरु से कर रही है, लेकिन अवास्तविक कहकर मांग ठुकरा दी जाती है। इसलिए संविधान पीठ के इस ऐतिहासिक फैसले से केजरीवाल सरकार को राहत तो मिलेगी, लेकिन अवरोधों से निजाद मिलना फिलहाल कठिन ही है।

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