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मौलिक चिंतन से हीन व्यक्ति नहीं है वास्तविक पत्रकार

वैसे तो पत्रकारिता हेतु डिग्रियों का निर्धारण हो चुका है और अब डिग्रीधारी होने के बाद पत्रकार का टैग लग जाता है , पर आज भी डिग्री के बिना पत्रकार और पत्रकारिता कर रहे लोगों की कमी नहीं है।

असल में डिग्री हो या ना हो परंतु पत्रकार का अपना मौलिक चिंतन होना चाहिए और वह सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हुआ हो। ऐसे में डिग्री ना होना कोई बड़ा सवाल नहीं रह जाता? परंतु समय के साथ व्यवसायिकता के केन्द्र में पत्रकारिता का खूब क्षरण हुआ तो किसी भी व्यक्ति द्वारा अखबार की एजेंसी लेकर पत्रकार बन जाना , एक बदनुमा दाग से कम नहीं है।

जिले व ग्रामीण स्तर पर ऐसे तमाम पत्रकार देखे जा रहे हैं, जो थानों व कोतवाली की दलाली के लिए अधिक जाने जा रहे हैं। इनका अपना कोई मौलिक चिंतन नहीं होता। सामाजिक बदलाव के लिए योगदान भी नगण्य होता है।

समाज में खरपतवार की तरह ऐसे पत्रकारों का उगना व्यवस्था के लिए खेत में खड़ी फसल की तरह घातक है। इस पर सरकार भी कुछ खास कर नहीं सकती। क्योंकि सीधा सी ढाल अभिव्यक्ति की आजादी है, जिसके पीछे दलाली का धंधा खूब फल फूल रहा है। यहाँ तक की कुछ पत्रकार टैंपो - टैक्सी स्टैंड भी चलाने में माहिर हैं और उससे रोजी-रोटी दबंगई के साथ चलाई जा रही है। इनकी पत्रकारिता के इस हुनर के आगे थानेदार की दमदारी कमतर नजर आती है।

पत्रकारिता जगत में भी ऐसे लोगों पर सामूहिक पेंच कसने के लिए कोई खास कदम उठाने की सोच का अभाव नजर आता है। इसकी वजह भी हर किसी का एनकेन प्रकारेण व्यवसायिकता से जुड़ा होना है। आज के दौर में ऐसा होना शुरूआत से ही सरकारों का पत्रकारिता के प्रति अदूरदर्शी रवैया रहा है। अगर समय समय पर सरकारें चेततीं तो गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता के दर्शन होते और सामाजिक बदलाव में अच्छे लोग कम से कम इस एक क्षेत्र अच्छा काम कर सकते हैं। परंतु अभी तक तो मौलिक चिंतन से हीन जबरदस्ती के पत्रकार अधिक नजर आते हैं।

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