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मोदी की कड़वी चाय जैसा जीएसटी, फायदा एक नुक्सान हजार

आर्थिक मोर्चे पर मोदी सरकार पूरी तरह से असफल साबित हुई है। इसका सबूत एक देश एक टैक्स सिद्धांत के तहत लागू किए गए जीएसटी की सालाना रिपोर्ट को आमजन के चश्में से देखने और परखने वाले खूब दे रहे हैं। दरअसल एक जुलाई 2017 को सालभर पहले ही जीएसटी (गुड्स एवं सर्विसेज टैक्स) यानी वस्तु एवं सेवा कर पूरे देश में यह कहते हुए लागू किया गया था कि इससे देश में महंगाई कम हो जाएगी, व्यापारियों को अधिक लाभ प्राप्त होगा और कर चोरी करने वाले जेल की सलाखों के पीछे होंगे। इन मोटी-मोटी बातों और दावों पर ही हम जब ध्यान केंद्रित करते हैं तो पाते हैं कि इनमें से कोई भी काम नहीं हुआ। मतलब न तो महंगाई कम हुई और न ही मझौले व छोटे व्यापारियों को ही लाभ मिला।

जीएसटी के दुष्परिणाम स्वरुप अनेक व्यापारी व कारोबारी तो इसकी मार से इस कदर घायल हुए कि उन्हें अपना धंधा-पानी ही बंद करना पड़ गया। बावजूद इसके मोदी सरकार ने धूम-धाम के साथ जीएसटी दिवस का जश्न भी मना ही लिया। इस मौके पर मोदी सरकार के मंत्री जीएसटी की उपलब्धियां गिनाते नजर आए तो वहीं कांग्रेस ने इसकी खामियों को उजागर करने में कोई कोताही नहीं बरती, जिससे जीएसटी की और सरकार की बखियां भी उधड़कर सबके सामने आ गईं। इसे हम राजनीतिक मान लेते हैं, लेकिन वास्तविकता भी तो इससे अलग दिखाई नहीं देती है। गौरतलब है कि जब जीएसटी लागू किया जा रहा था तब तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली को शायद यह मालूम ही नहीं था कि इसकी उपयोगिता क्या है, इसलिए जैसा बताया गया और समझाया गया उसी पर मोहर लगा दी गई, जबकि इसके दुष्परिणामों से अर्थशास्त्रियों समेत नीति बनाने वालों से सरकार को सचेत करने की खूब कोशिशें कीं थीं। हाल ही में जेटली ने जो बयान दिया उसमें उन्होंने चलताऊ भाषा का प्रयोग किया और सिर्फ उपलब्धियां गिनाकर अपना पल्ला झाड़ लिया।

अब जबकि वो यह कहते देखे गए कि जीएसटी समय और देश की मांग थी, तो यूपीए सरकार के दौर की वो बातें भी याद आ गईं जिसमें जीएसटी को क्रमबद्ध तरीके से लागू किए जाने की बात हो रही थी, तब ऐसे ही नेताओं ने इसका खुलकर विरोध किया था, अब वही कह रहे हैं कि यह तो समय और देश की मांग के तहत लागू किया गया। जब वो कहते हैं कि  जीएसटी के ज़रिए अर्थव्यवस्था में क्रांतिकारी सुधार हुए हैं और यह छोटे कारोबारियों के लिए गेम चेंजर साबित हुआ है तो उन्हें हकीकत से रुबरु कराने की आवश्यकता महसूस की जाने लगती है। इस मामले में कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने जो कहा उसे ही सामने रख दिया जाए तो बेहतर होगा। दरअसल चिदंबरम कहते हैं कि जीएसटी में कई खामियां हैं, जिससे आम लोगों की परेशानी बढ़ी है। इसमें शक नहीं कि खामियां थीं इसलिए लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकी, यह अलग बात है कि सरकार की आय में इजाफा हुआ, लेकिन पूरे देश की जनता को जिस कदर परेशान होना पड़ा उसकी ऐवज में यह लाभ नाममात्र ही कहा जाएगा।

जेटली यह तो सही बताते हैं कि जीएसटी और नोटबंदी के कारण पिछले साल प्रत्यक्ष कर संग्रह में 18 प्रतिशत की वृद्धि हुई, लेकिन जब वो यह कहते हैं कि जीएसटी से छोटे व्यापारियों को काफी लाभ मिला है तो वो गलत साबित हो जाते हैं, क्योंकि छोटे व्यापारियों का व्यापार तो कब का चौपट हो चुका है। छोटे कारोबारियों की आय के स्रोत भी अब बड़े और स्थापित कारोबारियों के खातों में जमा होने लगे हैं। इससे बाजार में अजीब तरह का सन्नाटा पसरा हुआ है। आमजन परेशान है कि महंगाई लगातार बढ़ रही है जबकि सरकार ने उन्हें सपना दिखाया था कि नोटबंदी और जीएसटी लागू हो जाने के बाद काला धन जो विदेशों में जमा है या अमीरों के यहां दबा पड़ा है अचानक सरकारी खजाने में आ जाएगा और उसका लाभ आमजन को ही मिलेगा, लेकिन ऐसा तो होता हुआ कतई नहीं दिखाई दिया। बिना विचारे जीएसटी लागू करने का खामियाजा तो छोटे कारोबारियों के साथ ही साथ आमजन को ही भुगतना पड़ा है।

जीएसटी की रूपरेखा से लेकर उसके ढांचे, दर और अनुपालन में इस कदर खामियां रहीं कि उसके परिणाम विपरीत ही आए और परेशान लोग अब उसका नाम लेना भी पसंद नहीं कर रहे हैं। चिदंबरम के शब्दों में जीएसटी आम लोगों के बीच में एक अपशब्द बन गया है। इस प्रकार जीएसटी लागू होने से टैक्स प्रशासन तो खुश हुआ क्योंकि उसके अधिकारों में इजाफा हो गया, उसकी शक्तियां बढ़ गईं और इसके जरिए उसे एक तरह से चाबुक चलाने का अवसर मिल गया, लेकिन इससे आम नागरिक खुश हुआ हो ऐसा कतई नहीं है, क्योंकि उसके सिर पर तो कर का बोझ और बढ़ा दिया गया। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि सरकार ने अपनी आय बढ़ाने के इंतजाम तो कर लिए, लेकिन आमजन को राहत पहुंचाने के लिए कर के बोझ से उसे रत्तीभर भी छूट नहीं दी। नतीजे में सरकार और टैक्स प्रशासन खुशी-खुशी जीएसटी दिवस मनाता नजर आया तो वहीं महंगाई की मार सहता आम इंसान आंसूं पोंछते कहीं किसी कोने में दुबका नजर आया है।अंतत: जीएसटी प्रधानमंत्री मोदी की उस कड़वी चाय के समान साबित हुई है जिसके फायदे तो नजर नहीं आ रहे हैं, लेकिन नुक्सानात के निशान आमलोगों के जेहन और दिलों में साफ देखे जा सकते हैं। इसके परिणाम मोदी सरकार को तो देखने को नहीं मिलेंगे, लेकिन यह तय है कि आमचुनाव में भाजपा इससे दो-चार जरुर होती हुई दिखेगी।

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