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लोकतांत्रिक देश में लीडरों पर हमले से आशय

वैसे तो कहा यही जाता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में हिंसा के लिए लेशमात्र भी गुंजाइश नहीं होती है, क्योंकि इसमें बुलेट का जवाब बैलेट से देने का इंतजाम है। इसके चलते बहुत ही शांति के साथ सत्ता परिवर्तन वोटों के जरिए कर दिया जाता है। ऐसे में सिंहासन पर कौन बैठेगा और कौन उतरेगा इसका फैसला करने का जिम्मा देश का असली मालिक यानी आमजन ही करता है, लेकिन अफसोस के साथ यह भी कहना पड़ता है कि इस लोकतांत्रिक व्यवस्था को धत्ता बताते हुए धनबल और बाहुबल आदि का प्रयोग करके सत्ता हथियाने और प्रतिद्वंदी को किनारे लगाने के जो प्रमाण मिलते हैं वो हिंसावादियों के प्रवल होने का संदेश भी देते हैं। इस मामले में हमारे अपने अनुभव बहुत ही कड़वे और दर्दनाक रहे हैं।

दरअसल विघटनकारी ताकतों ने कहीं न कहीं हिंसावादियों को प्रश्रय दिया हुआ है, जिसके चलते समय-समय पर हिंसा और भीड़तंत्र के हावी होने के उदाहरण भी मिल ही जाते हैं। कहने में हर्ज नहीं कि लोकतंत्र की जगह भीड़तंत्र को स्थापित करने का काम जिस तरह से किया गया, उससे देश में हिंसक घटनाएं बढ़ी हैं। उसी के फेर में अनेक लीडरों को हमने असमय खोया भी है। यह क्या कम बात है कि देश के अंदर ही लोकतंत्र को धत्ता बताते आतंकी हमारे चहेते लीडरों को हलाक करने में सफल हो जाते हैं और हम हाथ पर हाथ धरे कुछ नहीं कर पाते हैं। आखिर युवा नेतृत्व को नई दिशा देने वाले भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या किस तरह से की गई, उसे देशवासी कैसे भुला सकते हैं।

देश की दिशा और दशा तय करने वाले ऐसे जनप्रतिनिधियों की सुरक्षा तो हर मोर्चे पर होनी चाहिए, लेकिन उससे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये हिंसावादी प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वालों पर क्योंकर कार्रवाई नहीं हो पाती है, जबकि वो पूरी तरह जनतंत्र के विरुद्ध होते हैं। यहां इस समय यह सब कहने की आवश्यकता इसलिए आन पड़ी है क्योंकि वर्तमान में आगामी आमचुनाव को लेकर जारी कोलाहल के बीच खबर आ रही है कि गृह मंत्रालय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को रोड शो से बचने की सलाह दी है। यह सलाह इसलिए दी गई है क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी पर बड़े हमले का अंदेशा जताया गया है।

सूत्रों के हवाले से बताया जा रहा है कि गृह मंत्रालय ने नई एडवाइजरी जारी की है जिसके तहत अब मंत्री और आला अधिकारी भी एसपीजी की अनुमति के बिना प्रधानमंत्री मोदी के पास नहीं जा सकेंगे। 'अब तक के सबसे बड़े खतरे' की आशंका जताए जाने के साथ गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों के पुलिस प्रमुख को चिट्ठी लिखकर 'अज्ञात खतरे' से अलर्ट रहने के निर्देश जारी कर दिए हैं। यही नहीं बल्कि नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने प्रधानमंत्री की सुरक्षा में लगी विभिन्न एजेंसियों को भी सचेत कर दिया है। इस प्रकार खबर यदि सत्य पर आधारित है तो चिंता की बात यह है कि साल 2019  में होने जा रहे आमचुनाव पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है।

गौरतलब है कि कुछ समय पहले भी प्रधानमंत्री मोदी की सुरक्षा को लेकर बड़ी खबर आई थी, जिसमें कहा गया था कि माओवादियों द्वारा उन्हें मारने की योजना का खुलासा एक पत्र के माध्यम से हुआ। इस पत्र के हवाले से कहा गया था कि उन्हें भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की तरह मारने की साजिश रची गई है। इसके बाद सक्रिय हुए गृह मंत्रालय ने प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए नए नियम बनाए ताकि उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। बहरहाल इस अज्ञात हमले की आशंका ने देश में बढ़ती हिंसा की घटनाओं पर भी ध्यान केंद्रित करने का काम किया है। भीड़ द्वारा कानून को हाथ में लेते हुए किसी की निर्मम हत्या कर देने का जो खेल पिछले चार सालों में खेला गया उसने हिंसावादियों को आगे बढ़ाने का काम ही किया।

समाज के सभ्रांत कहे जाने वाले वर्ग में भय का वातावरण उत्पन्न हुआ और इसे लेकर देशभर में असहिष्णुता की बात भी जोर-शोर से उठाई गई, लेकिन इन तमाम आबाजों को इसलिए दबा दिया गया क्योंकि उनमें से विरोधी पक्ष के प्रबल होने की बू आती थी। विरोध करने वालों को तो इसमें मोदी सरकार को बदनाम करने की साजिश भी नजर आती रही है। इस बहाने विपक्ष को दबाने का भी प्रपंच रचा गया और हर संभव कोशिश की गई कि विपक्षियों को किसी भी मोर्चे पर कहने लायक ही नहीं छोड़ा जाए। मतलब जिस कांग्रेस मुक्त देश की बात कही जाती रही है, उसके तहत अनेक कार्य किए गए, लेकिन परिणाम वैसे नहीं आए जैसे कि चाहे गए थे। इसके विपरीत सत्य कहने वालों ने लाख कहा कि लोकतंत्र में विपक्ष की महती भूमिका से कोई इंकार नहीं कर सकता है। विरोधी पक्ष के रहते हुए सरकार सही दिशा में काम करती है और अच्छे कार्य करने पर सरकार की पीठ थपथपाने का काम भी स्वस्थ विपक्ष का प्रमाण देने वाले करते हैं। अत: विपक्ष को खत्म करने की बजाय यदि महत्वपूर्ण फैसलों में विपक्ष को साथ लेकर चला जाता तो इस तरह की समस्या भी उत्पन्न नहीं होती। अंतत: कहना गलत नहीं होगा कि जिस नेता के पीछे आमजन का सैलाब चलता हो उसे आखिर जान का खतरा किससे हो सकता है।

इस तरह के खतरे पैदा होने से पहले ही समाप्त कर दिए जाते हैं, लेकिन यही हकीकत है कि अपनों से घिरे रहने के बावजूद राजनीतिक विरोधी अपना खेल खेल जाते हैं। इसलिए जब प्रधानमंत्री मोदी पर अज्ञात हमले की आशंका जाहिर की जाती है तो चिंता होना लाजमी है। देश के प्रधानमंत्री पर किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं आने पाए इसकी जिम्मेदारी समस्त देशभक्त नागरिकों की है और इसका ख्याल जरुर रखा जाना चाहिए।

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