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तालाबों का अन्तिम संस्कार कर समाज को जगाने का भगीरथ प्रयास

छतरपुर के लोगों ने तालाब बचाने का जो तरीका आजमाया वह काबिले तारीफ है। इस समय छतरपुर के लोग सांकेतिक रूप से तालाबों का अन्तिम संस्कार कर लोगों व शासन-प्रशासन की चेतना को जगाने का भगीरथ प्रयास कर रहे हैं। जिस शहर में देख लीजिए, तालाबों को लगभग खत्म किया जा चुका है। अतिक्रमणकारियों की भेंट चढ़ चुके ये तालाब कभी बुन्देलखण्ड का गौरव थे। बुन्देल राजाओं ने इन तालाबों को विशेष परिस्थितियों में खुदवाया था। वे जानते थे कि बुन्देलखण्ड में पानी की बेहद कमी है। प्राकृतिक रूप से निर्भर रहने के बजाये जल के संरक्षण पर ध्यान दिया जाना चाहिए और उन्होंने ये किया भी। तालाबों का व्यापक निर्माण उसी जल संरक्षण का एक भाग था। प्रसिद्ध लेखक अनुपम मिश्र ने अपनी पुस्तक ‘आज भी खरे हैं तालाब’ में इस बात का बखूबी जिक्र किया है। अनुपम मिश्र आज हमारे बीच जरूर नहीं हैं पर उनकी यह अनुपम कृति अद्वितीय है। लगभग पूरे देश के सभी जल संरक्षण का कार्य करने वाले समाजसेवी उनको अपने आदर्श के रूप में देखते हैं।

परन्तु कालान्तर में जल के संरक्षण की उपयोगिता को दरकिनार करते हुए हम सभी ने (यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हम सभी भी बराबर रूप से इस बात के दोषी हैं) इन तालाबों को मृतप्राय कर दिया। ज्यादा भूमि के चक्कर में तालाबों की भूमि का अतिक्रमण किया गया। नतीजतन आज ये तालाब लुप्त होने की कगार पर जा पहुंचे हैं। बचाने का प्रयास हमने कभी भी नहीं किया। सिवाय वर्तमान में जो छतरपुर में हो रहा है, संभवतः ये पहला प्रयास है, जब यह जनआन्दोलन बन रहा है।

छतरपुर में एक समय छोटे-बड़े सब मिलाकर 11 तालाब थे। कई तो अतिक्रमण की भेंट चढ़कर लुप्त हो गये। जबकि कई ऐसे हैं जिन्हें अतिक्रमणकारी लगातार सुरसा के मुंह की भांति लीलते जा रहे हैं। इन अतिक्रमणकारियों को किसी की भी चिन्ता नहीं रही। शासन और प्रशासन सदा इनकी जेब में रहे। इन्होंने जैसे चाहा वैसे तालाबों पर कब्जा किया। अब छतरपुर वासियों ने सांकेतिक रूप से तालाबों की तेरहवीं का कार्यक्रम आयोजित किया है। छतरपुर का छत्रसाल चैराहा इस जनआन्दोलन का गवाह बनेगा।

शहर का किशोर सागर तालाब, प्रताप सागर तालाब, संकट मोचन तालाब, सांतरी तलैया, ग्वाल मगरा तालाब, रानी तलैया, विंध्यवासिनी तलैया पर इस समय संकट छाया हुआ है। विशेषकर किशोर सागर तालाब पर समाजसेवियों की भृकुटी तनी है। कुछ जनप्रतिनिधि मानते हैं कि प्रताप सागर, संकट मोचन और किशोर सागर तालाब में ये अतिक्रमणकारी खासी तादाद में हैं। शिकायत बहुतों के खिलाफ हुई पर कार्यवाही अभी तक नहीं। वहीं इन अतिक्रमणकारियों में अपना नाम बेवजह घसीटने को लेकर दक्ष फार्मेसी कालेज के चेयरमैन डाॅ. अजय लाल ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। डाॅ. अजय लाल ने बुन्देलखण्ड न्यूज को इस बावत साक्ष्य उपलब्ध कराते हुए बताया कि वे अपना नाम इन अतिक्रमणकारियों में घसीटने पर वे एनजीटी के पास गये। उनसे जब साक्ष्य मांगा तो उसमें उनका नाम ही नहीं है।

डाॅ. अजय लाल साफ कहते हैं कि वे भी तालाबों में अतिक्रमण के खिलाफ हैं। और इस मुहिम में वे जनता के साथ हैं। तालाबों से अतिक्रमण हटना ही चाहिए। आखिरकार तालाब से ही हमारी संस्कृति का जुड़ाव भी है। परन्तु बिना जुर्म के दोषी करार दे देना, ये कहां का न्याय है। डाॅ. लाल, उन लोगों के खिलाफ कोर्ट जा रहे हैं जिन्होंने उनकी छवि धूमिल करने का प्रयास किया है।

ये एक उदाहरण है। तालाबों से अतिक्रमण हटना ही चाहिए, पर किसी बेकसूर को यूं न फंसाइये। तालाबों का बचाने का ये प्रयास सराहनीय है और इस प्रकार के प्रयास पूरे बुन्देलखण्ड में करना चाहिए। हो सकता है कि ऐसे आन्दोलन में कुछ लोग निजी खुन्नस निकालने के कारण किसी को फंसा देते हैं। और बेवजह वह गेहूं के साथ घुन की तरह पिस जाता है। लेकिन यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जिन लोगों का भी हाथ तालाब को नष्ट करने में रहा है उन्हें बिल्कुल भी नहीं बख्शना चाहिए। उनके कब्जे से तालाब को मुक्त कराकर उन्हें कठोर से कठोर दण्ड दिलाने का कार्य भी सतत होना चाहिए।

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