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धौलाधार पर्वत शृंखला में वास्तुकला का उत्कृष्ट धाम है बैजनाथ

हिमाचल प्रदेश में धौलाधार पर्वत शृंखला के बीचों-बीच स्थित प्राचीन शिव मंदिर बैजनाथ वास्तुकला का उत्कृष्ट धाम है। देश एवं विदेश में जिसे बैजनाथ (वैद्यनाथ) के नाम से जाना जाता है, मंदिर निर्माण में वास्तुकला को निखारने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। यह प्राचीन मंदिर अपनी वास्तु शैली का उत्कृष्ट नमूना है। पांडवों द्वारा निर्मित यह मंदिर अपनी सुंदरता की मिसाल है।

इस मंदिर के पीछे की पौराणिक कथा के अनुसार त्रेता युग में रावण ने कैलाश पर्वत पर शिवजी की तपस्या की थी। कोई फल न मिलने पर उसने घोर तपस्या प्रारंभ की और उसने अपना एक-एक सिर काट कर हवन कुंड में आहुति देकर शिव को अर्पित करना शुरू कर दिया। दसवां और अंतिम सिर काट कर हवन कुंड में आहुति देकर शिव को अर्पित करना शुरू किया तो शिवजी ने प्रसन्न होकर रावण का हाथ पकड़ लिया। उसके सभी सिरों को पुन: स्थापित कर शिव जी ने रावण से वर मांगने को कहा।

रावण ने कहा कि मैं आपके शिवलिंग स्वरूप को लंका में स्थापित करना चाहता हूं। आप दो भागों में अपना स्वरूप दें और मुझे बलशाली बना दें। शिवजी ने तथास्तु कहा और लुप्त हो गए। इससे पहले शिवजी ने अपने शिवलिंग स्वरूप दो चिन्ह रावण को देते हुए कहा कि इन्हें जमीन पर न रखना। रावण लंका की ओर चला। रास्ते में गौकर्ण क्षेत्र (बैजनाथ क्षेत्र) में पहुंचा तो उसे लघुशंका लगी। यहां उसे बैजु ग्वाला दिखाई दिया। रावण ने बैजु ग्वाले को शिवलिंग पकड़ा दिए और शंका निवारण के लिए चला गया।

शिवजी की मायावी शक्ति के चलते बैजु उन दोनों शिवलिगों का वजन अधिक देर तक उठा नहीं सका। उसने उन्हें धरती पर रख दिया और स्वयं पशु चराने लगा। इस तरह दोनों शिवलिंग वहीं स्थापित हो गए। रावण ने ये दोनों शिवलिंग मंजूषा में रखे थे। मंजूषा के सामने जो शिवलिंग था, वह चंद्र माल के नाम से प्रसिद्ध हुआ और जो पीठ की ओर था वह बैजनाथ के नाम से जाना गया। मंदिर के प्रांगण में छोटे मंदिर और नंदी बैल की मूर्ति स्थापित है। नंदी के कान में भक्तगण अपनी मन्नत मांगते हैं। रावण खाली हाथ लंका लौट गया लेकिन बैजनाथ में शिवलिंग की अमूल्य धरोहर छोड़ गया। इस मंदिर का निर्माण राजा लक्ष्मण चंद के राज्य के दो सगे भाइयों मन्युक व आहुक ने किया। वे इसी रास्ते से व्यापार करने जाते थे और काफी धनी थे। इन्होंने ही शिव मंडप और मंदिर बनवाए थे। राजा और दोनों भाइयों ने बहुत धन व भूमि दान भी किया।

पत्थरों पर नक्काशी एवं भारतीय वैदिक संस्कृति में वर्णत ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव तथा देव प्रतिमाओं को बखूबी उकेरा गया है जो आज भी प्राचीन वास्तु कला के अनुपम उदाहरण हैं। इसके पुन: निर्माण का उल्लेख शिलालेखों पर वर्ष 804 में दिया गया है। समुद्र तल से लगभग चार हजार फुट की ऊंचाई पर इस दिव्य धाम को देखकर सभी अचम्भित होते हैं। शताब्दियों पूर्व इस दुर्गम स्थल में भव्य पूजा स्थल का चंद्राकार पहाडिय़ों, घने जंगलों के नैसर्गिक घाटी में निर्माण किसी अजूबे से कम नहीं है। यहां विजयादशमी पर रावण का पुतला नहीं जलाया जाता। इस कार्य को करने का जिसने भी प्रयास किया वह सफल नहीं हो सका। अत: रावण को देवत्य रूप सम्मान दिया जाता है। मंदिर की परिक्रमा एवं किलेनुमा छ: फुट चौड़ी चारदीवारी महाराजा संसार चंद द्वितीय ने बनवाई। तब से लेकर यह शैली, वास्तु, विद्या एवं वैदिक परम्परा में पूज्य शिवलिंग अपनी पहचान रखता है।

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