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सुनहरे इतिहास को रचती ट्रंप और किम की मुलाकात

किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि कल तक जो एक दूसरे को फूटी आंख नहीं सुहाते थे वो चंद मिनटों की मुलाकात के बाद ही 'याराना' की डींगें हांकते नजर आएंगे। अमेरिका और उत्तर कोरिया के प्रमुख नेताओं के मिल-मिलाप के संबंध में यही कहा जा सकता है। दरअसल एक तरफ उत्तर कोरिया है जो लगातार परमाणु परीक्षण कर अमेरिका को चुनौती देता और हमले करने की धमकी देने से भी पीछे नहीं हटता था। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका है जिसने उत्तर कोरिया को सबक सिखाने की मानों कसम खा रखी थी। इस कारण वह जापान और दक्षिण कोरिया को हर संभव मदद देने और उत्तर कोरिया पर पाबंदियां लगाकर सबक सिखाने के प्रयास में व्यस्त दिखता रहा। अब ट्रंप और किम दो बिछड़े दोस्तों की तरह कुछ ऐसे मिले हैं मानों पहले कभी कोई शिकवा-शिकायत था ही नहीं। यहां अंदेशा इस बात को लेकर अभी भी बरकरार है कि ट्रंप पर कितना भरोसा किया जाए, क्योंकि परमाणु अप्रसार संधी को लेकर जब ट्रंप ईरान से समझौता तोड़ सकते हैं तो ऐसे में उत्तर कोरिया को उसी डगर पर चलते हुए किन शर्तों के आधार पर विश्वास करना चाहिए।

विचार करें कि अभी उत्तर कोरिया तो शुरुआती दौर पर है, जबकि ईरान तमाम कठिनाइयों से उबरते हुए अपने आपको साबित करने में सफलता हासिल कर चुका है। बहरहाल दुनिया के इतिहासकारों को ट्रंप और किम की यह मुलाकात 1972 के उस दौर की याद ताजा कराती है जिसमें कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और चीन के सर्वोच्च नेता माओत्सेतुंग मिले थे। इन दोनों मुलाक़ातों में समानताएं तलाशने वाले कहते हैं कि उत्तर कोरिया की तरह उस वक्त चीन भी सांस्कृतिक क्रांति की उथल-पुथल के कारण पूरी दुनिया से अलग-थलग पड़ गया था। तब चीन के अमेरिका से औपचारिक संबंध भी शेष नहीं रह गए थे। ठीक वैसे ही जैसे कि वर्तमान में उत्तर कोरिया के परमाणु परीक्षणों के कारण अमेरिका समेत अन्य देशों से उसके संपर्क टूट चुके थे। अनिश्चितता के इस दौर में उत्तर कोरिया के प्रमुख नेता किम जोंग उन ने अचानक अपनी नीति में भारी बदलाव करते हुए तमाम देशों से मिलने और दोस्ताना ताल्लुकात बढ़ाने की दिशा में न सिर्फ विचार किया बल्कि ठोस कदम भी आगे की ओर बढ़ाए। यहां तक कि पड़ोसी दुश्मन मुल्क कहे जाने वाले दक्षिण कोरिया को भी किम ने गले लगाने में सेकंड की देरी नहीं की। इसे देखकर दुनिया ने किम की तारीफ की और शांति और सहअस्तित्व की खातिर उससे संबंध बनाने पर भी जोर दिया। इसके बाद जब बात अमेरिका की आई तो किम ने देशवासियों को समझाया और बताया कि उन्हें अमेरिका के साथ शांतिपूर्वक रहने की ज़रूरत है। यह कथन बताता है कि समय भले बदल गया हो लेकिन हालात वैसे ही हैं जैसे कि इतिहास के पन्नों में दर्ज है।

मानों इतिहास अपने आपको दोहरा रहा है, फर्क बस यही है कि यहां चीन की जगह उत्तर कोरिया के प्रमुख नेता किम और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप हैं। तब चीन की सरकार ने अपने लोगों को समझाने की कोशिश की थी कि तृतीय विश्व की क्रांति में अमेरिकियों का साथ जरुरी है और अब किम अपने लोगों को समझा रहे हैं कि शांति के लिए अमेरिका से संबंध जरुरी है। बहरहाल दुनिया ने देखा कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरिया के प्रमुख नेता किम जोंग उन जब पहली बार सिंगापुर के सेंटोसा द्वीप में ऐतिहासिक वार्ता के लिए मिले, तो मानों शांति का शंखनाद हो गया। इस संबंध में इतिहास की एक और इबारत पर नजर दौड़ाई जाए जिसमें लिखा है कि वर्ष 1950 से 53 के बीच हुए कोरियाई युद्ध के बाद से अमेरिका और उत्तर कोरिया के नेता कभी मिले ही नहीं। यहां तक कि दोनों में बातचीत तक पूरी तरह बंद रही, फिर यह मुलाकात सवालों को जन्म तो देती ही देती है।

इसलिए जो सामने दिख रहा है या दिखाने की कोशिश की जा रही है उसके उलट पर्दे के पीछे बहुत कुछ चल रहा है। अब वही तय करेगा कि इस मुलाकात के लिए कौन जिम्मेदार रहा है और आने वाले समय में कौन किस पर भारी पड़ने वाला है, क्योंकि इसके बगैर सुनहरा इतिहास रचने वाली प्रतीत होती यह मुलाकात अधूरी ही है।

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