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आनंद स्वर्ग है , दुख - दर्द नर्क है और फैसला आपका

एक पत्थर की मूर्ति होती है , जो मंदिर में अंदर रखी रहती है। वे भगवान होते हैं। सबको पता है कि ईश्वर हैं। वहाँ लोग उनकी पूजा करने जाते हैं। पूजा क्यों करते हैं ? इसलिये करते हैं कि किसी ना किसी को कोई ना कोई तकलीफ है। तिनका भर की तकलीफ हो या दुख दर्द से निजात चाहिए अथवा ऐश्वर्य से अधिक ऐश्वर्य चाहिए। संतुष्टि ना हो इसलिए अधिक चाहत होती है। शायद इसलिए ही मनुष्य मात्र को समझाने के लिए कहा गया है " संतोषम् परम सुखम"। संतोष से बढ़कर कोई और सुख नहीं है। सच है कोई धन की लालशा से परेशान है , किसी को अधिक धन ही धन चाहिए। कितना भी हो पर चाहिए भले उस धन का सदुपयोग ना कर पाए हों , मंदिर में नोट इसलिये गुप्त दान में डालेंगे ताकि और नोट आने का रास्ता बने और कुछ नहीं तो उम्मीद ही बहुत है। बल्कि हकीकत है कि ईश्वर कृत उस मनुष्य की सेवा में मेवा नहीं महसूस होती , जो गरीब है। इतना नहीं सोच सकते कि गरीब असहाय की सेवा ही सच्ची ईश्वर भक्ति है। गरीब को दत्कार देंगे और अमीर का अमीरी से स्वागत करेंगे ? अमीर के स्वागत में सुख महसूस करेंगे भले वह स्वागत से खुश हो या ना हो , ईश्वर भी ऐसे ही हैं , वे तुम्हारे पुष्प अर्पण करने से ज्यादा तब खुश होगें जब किसी जरूरतमंद की मदद " गुप्त दान " की तरह कर दो। हाँ मदद करने की बात का प्रसार भी करो तो यह सोचकर कि लोगों को प्रेरणा मिलेगी और ज्यादा से ज्यादा लोग असहाय , अनाथ और गरीबों की मदद करना ही ईश्वर की भक्ति महसूस करें। 

चिंतन करने की बात है , ईश्वर के समक्ष मन ही मन अपना दुख दर्द कह लेते हो। पत्थर की मूर्ति है फिर भी कहते हो , वजह क्या है ? पता है कि पत्थर की मूर्ति सुनती नहीं है पर हाँ कहीं भगवान हैं वे सुनते हैं , ऐसा विश्वास है ! अतः उस मूर्ति के सामने सारे रहस्य उजागर कर देते हो , वह भी इस तरह कि दुनिया ना सुन सके। अगर दुनिया सुन लेगी मजाक बन जाएगा। दुनिया में अपना मजाक बनने से डरते हो या फिर कोई ऐसा विश्वास योग्य साथी नहीं मिल सका , बन सका जिससे अपना दर्द साझा कर सको ? 

मनुष्य और मनुष्य के मध्य ही कितना अविश्वास है कि पशु और पशु के मध्य अविश्वास नहीं है। सच है कि मनुष्य की अपेक्षा पशु - पक्षी से प्रेम करना सरल है। वह शंका नहीं करते , क्यों और क्या , कैसे जैसे सवाल नहीं करते वह तनिक से स्पर्श से तुम्हारे प्रेम के गुलाम नजर आते हैं। तलुवे चाटने लगते हैं , पैरो पर बैठ जाते हैं या पक्षी कंधे पर बैठ जाता है। यहाँ तक कि पक्षी नर और नारी का भेद नहीं करता। बड़ा विहंगम दृश्य देखा था , एक महिला ने तोता पाला रखा था। वह उसे चूमती तो तोता भी चूम लेता था। पूरे परिवार के सामने चूम लेता था। कहीं कोई मान - मर्यादा , पवित्र - अपवित्र , व्रता जैसे शब्दों से कुछ भंग नहीं हुआ। परंतु सामान्य तौर पर ऐसा नहीं होता , हम मनुष्यों ने जाने कितनी बेड़ियां बना रखी हैं और उन्ही बेड़ियों बंधे हुए स्वयं को स्वतंत्र कहते हैं , यह हमारी बड़ी भूल है। अगर हम सब सुखी होते , धनाढ्य हों अथवा गरीब कोई भी तो ईश्वर के दरवाजे कुछ मांगने नहीं जाते , बल्कि जाते भी तो दर्शन के लिए। जीवन आनंद का लुत्फ उठाने।

जीवन दर्शन स्वयं महसूस नहीं कर सके और लगे ईश्वर के अस्तित्व पर सवाल उठाने ? राज की बात यही है कि सामान्य तौर पर हम वहाँ अपनी बात कहते हैं , जहाँ उसके सुने जाने के साथ सुलझने की आशा होती है या बात का प्रसार हो सके , लोग सराह सकें अर्थात सोशल साइट्स से ही ले लीजिए प्रभावशाली व्यक्तित्व हो तो ना कुछ की बात में भी रिएक्शन की भरमार होगी और नहीं तो अच्छी से अच्छी बात पर भी लोग नजरंदाज कर जाते हैं। ये हम मनुष्य हैं और राजदार हैं। धार्मिक स्थलों पर दान और भीड़ का प्रमाण है कि मनुष्यता में बड़ा भारी लोचा है। ईश्वर के दर्शन मन से महसूस किए जा सकते हैं और फिर मंदिर जाओगे भी तो दर्शन हेतु ना कि सामान्यतया किसी से कुछ ना बोलने वाला बडबडाने हेतु , दुनिया से घबराते हैं तब तो ऐसा होता है।

विश्वास कायम रखिए , विश्वास जीतिये और कृतज्ञता जताइए फिर महसूस करेंगे संसार खूबसूरत है और जिंदगी में आनंद ही आनंद है। आनंद स्वर्ग है , दुख दर्द नर्क हैं। भोगना है भोगिए , फैसला आपका !

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