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बिहार में सत्ता पक्ष के घड़ियाली आंसू के निहितार्थ

कर्नाटक में चुनाव परिणाम आने के साथ जो हुआ उसे देखते हुए बिहार में विपक्ष को मानों संजीवनी हासिल हो गई। एक तरफ सोया हुआ विपक्ष जागा तो वहीं बिहार के नेता विपक्ष तेजस्वी यादव ने भी अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी और ऐलान किया कि चूंकि संविधान सभी को एक जैसा अधिकार देता है, अत: सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते सरकार बनाने का दावा तो बनता ही है। इसी आधार पर तेजस्वी ने कहा कि कर्नाटक की तरह ही सरकार बनाने के लिए राज्यपाल द्वारा हमें न्यौता दिया जाना चाहिए। वैसे तो यह सब कहने-सुनने जैसी ही बातें थीं जो आई और गई हो गईं, लेकिन इसी बहाने  तेजस्वी सक्रिय हुए तो लोग भी उनसे जुड़ते चले गए। चूंकि उनके पिता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव को  चारा घोटाले मामले में जेल जाना पड़ा अत: ऐसे संकटकाल में पार्टी को एकजुट रखने की जिम्मेदारी तेजस्वी के ही कंधे पर रही।

ऐसे में राजनीतिक उठा-पटक करते हुए खुद को स्थापित करने के लिए मानों तेजस्वी को सुनहरा अवसर मिल गया। कुछ तो करना ही था सो इसी बहाने तेजस्वी की पहचान राज्य के प्रत्येक कोने से हो गई, लोगों ने भी जाना कि उनका नेता उनके साथ खड़े होने के लायक हो गया है, क्योंकि उसमें लोगों के दु:ख-दर्द समझने और उसके खिलाफ आवाज उठाने की शक्ति जो आ गई है। इसे भाजपा ही नहीं बल्कि मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के लिए भी खतरे की घंटी माना जा रहा है, जिसका असर चारों ओर देखने को मिल रहा है। वैसे भाजपा और नीतिश कुमार की पार्टी का गठबंधन मजबूरी के तहत हुआ। एक तरफ भाजपा किसी भी कीमत पर सरकार में आना चाहती थी तो वहीं दूसरी तरफ कानूनी उलझनों से बचने के लिए नीतिश कुमार को केंद्र की सरपरस्ती भी चाहिए थी, इसलिए मौकापरस्ती में माहिर नेताओं ने अटूट कहे जाने  वाली नीतिश और लालू की जोड़ी को भी तोड़ने में देरी नहीं लगाई।

इसके बाद लालू का जेल जाना बताता है कि भाजपा अपने आपको मजबूत करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं रखेगी, लेकिन इसी बीच ऐसा कुछ हुआ कि भाजपा अब बैकफुट पर जाती हुई नजर आ रही है। दरअसल लोकसभा और विधानसभा उपचुनाव में लगातार भाजपा की हुई हार ने विरोधियों के साथ ही साथ सहयोगियों को भी मुखर कर दिया है। इस हार के चलते भाजपा के सहयोगी दल भी अब अपनी-अपनी शर्तें गिनाने लगे हैं। ऐसे नेताओं में नीतिश का नाम भी शुमार कर दिया जाए तो गलत नहीं होगा। दरअसल उपेन्द्र कुशवाह और रामविलास पासवान के बाद नीतिश कुमार की जनता दल यूनाइटेड यानी जेडीयू ने एक बैठक के बाद कहा कि लोकसभा या विधानसभा का चुनाव बिहार में नीतिश के नेतृत्व और चेहरे पर ही लड़ा जाना चाहिए। हालांकि जदयू की इस मांग पर आधिकारिक तौर पर किसी ने कुछ नहीं किया, लेकिन जिन्हें मुखर होना था वो तो हो ही गए।

बिहार में ही भाजपा नेता कह रहे हैं कि यदि जदयू को नीतिश पर इतना अतिआत्मविश्वास है तो विधानसभा उपचुनाव में हर बार तीस हज़ार से अधिक से उनके प्रत्याशियों की हार कैसे हो जाती है। यह दूसरी बात है कि इस समय भाजपा कोशिश में है कि सभी सहयोगियों को एक साथ रखा जाए इसलिए ख़ुद राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित इस मामले में सभी से बात करने की बात कहते देखे गए, लेकिन यहां भी कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिले हैं, जिससे असमंजस की स्थिति बनी हुई है। यह अलग बात है कि राज्य में भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी जरुर कहते देखे गए कि नीतिश राज्य सत्ताधारी गठबंधन के नेता हैं और एनडीए 2019 के आम चुनावों में जदयू अध्यक्ष नीतिश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यों के आधार पर वोट मांगेगा। मतलब नीतिश को साथ में रखकर ही चुनाव मैदान में उतरा जाएगा। इन जोड़-तोड़ वाले बयानों के बीच भाजपा सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने जो कहा वह विशेष मायने रखता है।

दरअसल शत्रु ने नीतिश को निशाने में लेते हुए कहा कि 'एनडीए में शामिल मेरे दोस्त बिहार के लिए कुछ काम करना शुरू करो, नहीं तो अर्जुन यानी तेजस्वी यादव आपकी सत्ता हथियाने के लिए तैयार है।' बकौल शत्रु, 'तेजस्वी यादव की चुनौती अब बिहार के हर कोने से सुनाई दे रही है...जय बिहार! जय हिंद!' शत्रु के इस ट्वीट से दो बातें स्पष्ट हो गई हैं, पहली यह कि वो भले ही मोदी सरकार के काम-काज और पार्टी शीर्ष नेतृत्व के फैसलों से असंतुष्ट रहे हों, लेकिन पार्टी के लिए एक सच्चे सिपाही की तरह लगातार सीमा पर खड़े दिखे हैं। ऐसे में जबकि बिहार में भाजपा अपने पैर मजबूत करने में लगी है तो शत्रु ने नीतिश पर निशाना साधकर बतला दिया है कि सिर्फ बयानों से अब कुछ हासिल होने वाला नहीं है, क्योंकि इसके बाद जब चुनाव में जनता के बीच वोटों की खातिर जाया जाएगा तो लोग यही पूछेंगे कि केंद्र और राज्य सरकार ने मिलकर आखिर राज्य को दिया ही क्या है, जिसके नाम पर उन्हें वोट दिया जाना चाहिए। इसी की याद दिलाते हुए शत्रुघ्न सिन्हा जहां बिहार को विशेष दर्जा दिए जाने की मांग को बकवास करार देते हैं तो वहीं आम चुनाव से पहले इस तरह की मांगों के उठने को राजनीतिक दलों के द्वारा घड़ियाली आंसू बहाने जैसा काम बताते हैं।

अगर यह सच भी है तो भी कम से कम सत्ता पक्ष घड़ियाली आंसू बहा तो रहा है, लेकिन उन लोगों का क्या जो कि पेटभर खा-पी लिया और डकार तक नहीं ली। ऐसे ही लोगों के साथ के कारण अब बिहार में नीतिश और उनके पार्टी नेताओं को घड़ियाली आंसू बहाना पड़ रहे हैं। मतदाता समझदार है और वह सब समझता है, इसलिए कहा जा रहा है कि काम पर ध्यान दें वर्ना घड़याली आंसू सचमुच के आंसू में तब्दील होते देर नहीं लगेगी।

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