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भगीरथ ने 3 बार तपस्या की थी तब उतरी थी गंगा धरती पर

महाराज भगीरथ अयोध्या के इक्ष्वाकु वंशी राजा थे । वह राजा दिलीप के पुत्र और महाराज अंशुमान के पौत्र थे।

महाराज भगीरथ को ब्रह्माण्ड की पवित्र नदी गंगा को धरती पर लाने का श्रेय दिया जाता है। पुण्य सलिला, पापमोचिनी और सदियों से मोक्ष दिलाने वाली गंगा को भगीरथ अपने पूर्वजों के मोक्ष के लिए लाए थे, लेकिन उसके बाद गंगा ने मानव की कई पीढ़ियो का उद्धार कर दिया और यह सब संभव हुआ भगीरथ की कठोर तपस्या से। महाराज भगीरथ अयोध्या के इक्ष्वाकु वंशी राजा थे । वह राजा दिलीप के पुत्र और महाराज अंशुमान के पौत्र थे। अंशुमान महाराज सगर के पुत्र थे। अशुमान ने अपने पूर्वजों को मोक्ष की जिम्मेदारी लेते हुए राज-पाट अपने पुत्र दिलीप को सौंप दिया था। उन्होंने इसके लिए घोर तपस्या की और अपना शरीर त्याग दिया। महाराज दिलीप ने भी गंगा को धरती पर लाने के अथक प्रयास किए और रुग्णावस्था में स्वर्ग सिधार गए। अब महाराज भगीरथ ने प्रण किया की वह किसी भी हालत में गंगा को धरती पर लाएंगे और आपने पूर्वजों को मोक्ष दिलवाएंगे। उन्होने घोर तप किया और गंगा को धरती पर लाने में सफल हुए।

भगीरथ ने जब गंगा को धरती पर लाने के संकल्प लिया तब उनका कोई पुत्र नहीं था इसलिए उन्होने राज-पाट अपने मन्त्रियों को सौंपा और गोकर्ण तीर्थ में जाकर घोर तपस्या में लीन हो गए। जब स्वयं ब्रह्मा उनको वर देने के लिए आए तो उन्होंने दो वर माँगे पहला पितरों की मुक्ति के लिए गंगाजल और दूसरा कुल को आगे बढ़ाने वाला पुत्र। ब्रह्मा ने उनको दोनों वर दिये। साथ ही यह भी कहा कि ' गंगा का वेग इतना अधिक है कि पृथ्वी उसे संभाल नहीं पाएगी इसलिए हे भगीरथ गंगा के धरती पर अवतरण के लिए तुमको महादेव से सहायता मांगनी होगी। ' महादेव को प्रसन्न करने के लिए भगीरथ ने पैर के अंगूठों पर खड़े होकर एक वर्ष तक कठोर तपस्या की। भूतभावन ने प्रसन्न होकर भगीरथ को वरदान दिया और गंगा को अपने मस्तक पर धारण कर लिया । लेकिनगंगा को अपने वेग पर बड़ा अभिमान था। गंगा का सोचना था कि उनके वेग से शिव पाताल में पहुँच जायेंगे। शिव को जब इस बात का पता चला तो उन्होने गंगा को अपनी जटाओं में ऐसे समा लिया कि उन्हें वर्षों तक शिव-जटाओं से निकलने का मार्ग नहीं मिला।

मां गंगा का धरती पर अवतरण

जब गंगा शिवजटाओं में समाकर रह गई तो भगीरथ ने फिर से तपस्या का मार्ग चुना। तब भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर गंगा को बिंदुसर की ओर छोड़ा । गंगा यहां से सात धाराओं के रूप में प्रवाहित हुईं। ह्लादिनी, पावनी और नलिनी पूर्व दिशा की ओर प्रवाहित हुई। सुचक्षु, सीता और महानदी सिंधु पश्चिम की प्रवाहमान होने लगी। । सातवीं धारा ने राजा भगीरथ का अनुसरण किया। राजा भगीरथ गंगा में स्नान करके पवित्र हुए और अपने दिव्य रथ पर चढ़कर चल दिये। गंगा उनके पीछे-पीछे चलने लगी। रास्ते में जह्नमुनि का आश्रम था गंगा के जल से जह्नुमुनि की यज्ञशाला बह गयी। क्रोधित होकर मुनि ने सम्पूर्ण गंगा जल पी लिया। इस पर चिंतित होकर समस्त देवताओं ने जह्नुमुनि का पूजन किया और गंगा को उनकी पुत्री बताते हुए क्षमा-याचना की।

देवताओं की प्रार्थना पर जह्नु ने कानों के मार्ग से गंगा को बाहर निकाला। तभी से गंगा जह्नुसुता जान्हवी भी कहलाने लगीं। इसके बाद भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर गंगा समुद्र तट तक पहुँच गयीं। यहां से भगीरथ गंगा को कपिल मुनि के आश्रम ले गए और अपने पितरों की भस्म को गंगा के स्पर्श से मोक्ष दिलवाया। इस पर प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने वरदान दिया कि 'हे भगीरथ , जब तक समुद्र रहेगा, तुम्हारे पितर देवतुल्य माने जायेंगे और गंगा तुम्हारी पुत्री कहलाकर भागीरथी नाम से विख्यात होगी। साथ ही वह तीन धाराओं में प्रवाहित होगी, इसलिए त्रिपथगा कहलायेगी।’

राजा भगीरथ ने सौ अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था। उनके महान् यज्ञ में इन्द्र सोमपान कर मदमस्त हो गये थे। इसके साथ ही भगीरथ ने गंगा के किनारे दो स्वर्ण घाट भी बनवाये थे। उन्होंने रथ में बैठी अनेक सुन्दर कन्याएँ धन-धान्य सहित, ब्राह्मणों को दानस्वरूप दी थी।

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