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38 पार्टियों को मिलने वाला चंदा जोड़ दें फिर भी बीजेपी भारी

लोकतंत्र को कमजोर करेगा धनबल का बोलबाला

राजनीति में वोट का जितना महत्व होता है, उससे कम नोट का भी महत्व नहीं है। अगर देश की छह बड़ी पार्टियों को देखा जाए तो कांग्रेस को 41.90 करोड़, राष्ट्रवादी कांग्रेस को 6.34 करोड़, सीपीएम को 5.25 करोड़, तृणमूल कांग्रेस को 2.15 करोड़ और सीपीआई को 1.44 करोड़ रुपए का चंदा मिला है। यानी कुल मिलाकर 57.08 करोड़ रुपए का चंदा मिला है और अकेले बीजेपी को 532.27 करोड़ रुपए का चंदा मिला है। यानी बीजेपी को छह राष्ट्रीय दलों को मिले चंदे से करीब नौ गुना ज्यादा चंदा मिला है। बीजेपी का अपना रिटर्न बता रहा है कि उसके पास पैसा जमकर आ रहा है। जहां बीजेपी को 2015-16 में बीस हजार रुपए से ज्यादा के चंदे के रुप में 76 करोड़ 85 लाख रुपए मिले थे, वे 2016-17 में बढ़कर 532 करोड़ 27 लाख रुपए हो गए। यानी एक बरस में 593 फीसदी का उछाल, जबकि कांग्रेस के 20 हजार रुपए से ज्यादा के चंदे में महज 105 फीसदी का उछाल आया है। मान लिया जाए कि 2019 में राजनीतिक दलों के बीच अगर चुनावी लड़ाई पैसों के बूते खेली गई तो बीजेपी के सामने कोई टिक नहीं पाएगा। यदि धनबल के सहारे चुनाव जीते जा सकते हैं, तो फिर बीजेपी को कौन मात देगा।

बीजेपी के भारी चंदे की एक बानगी यह भी है कि न सिर्फ छह राष्ट्रीय दलों से नौ गुना ज्यादा फंड बीजेपी के पास पहुंचता है, बल्कि देश के 32 क्षेत्रीय दलों को भी जोड़ दें तो भी अकेले बीजेपी की कमाई इससे ज्यादा है। आलम यह है कि 2017 में अगर हर राजनीतिक दल की सारी कमाई को जोड़ दें तो कांग्रेस समेत छह राजनीतिक दलों को 524 करोड़ 90 लाख मिले और बीजेपी को 1034 करोड़ 27 लाख मिले। जिन पार्टियों के आसरे कांग्रेस एक ऐसा गठजोड़ बनाने की कोशिश कर रही है, जिससे बीजेपी को मात दी जाए तो फिर उनकी पूंजी पर नजर डालने पर भी बीजेपी ही भारी पड़ती दिख रही है।

कांग्रेस समेत छह राष्ट्रीय दलों की कमाई 524.90 करोड़ रुपए है, 32 क्षेत्रीय दलों की कमाई 321.03 करोड़ रुपए बैठती है तो अकले बीजेपी की कमाई 1034.27 करोड़ रुपए है। इस तरह 38 दलों की तमाम कमाई मिलाने पर भी बीजेपी की कमाई से 190 करोड़ रुपए कम ही रहेगी। यानी बीजेपी को लोकसभा में बहुमत मिला और राज्य दर राज्य बीजेपी को जीत मिलती चली गई तो देश के तमाम राजनीतिक दलों को मिलाकर हुई कमाई से भी दो अरब रुपए ज्यादा बीजेपी के फंड में आ गए। यानी हर चुनाव के बाद जब चुनाव आयोग यह बताता है कि उसने बांटे जा रहे सौ करोड़ जब्त कर लिए, तो 2014 के बाद से देश में औसत नोटों की जब्ती हर चुनाव में 300 करोड़ तक आ बैठती है। यानी तीन अरब रुपए वोटरों को बांटने के लिए अलग-अलग राजनीतिक दलों ने निकाले और जब्त हो गए। इसी के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने ही सवाल उठाया कि नोटों को बांटते हुए या ले जाते हुए पकड़े गए लोगों को सजा क्यों नहीं मिलती? संयोग से जिन कॉरपोरेट हाउस ने राजनीतिक दलों को चुनावी फंडिग की या राजनीतिक दलों के खातों में दान दिया, उनमें से अधिकतर बैंकों से लोन लेकर न लौटा पाने के हालातों में आ चुके हैं।

बता दें कि बैंको के घाटे को पूरा करने के लिए दो लाख करोड़ से ज्यादा सरकार दे चुकी है। तब क्या बैंकों का घाटा, एनपीए की रकम, बट्टे खाते में डालने का सच सबकुछ चुनावी लोकतंत्र से जा जुड़ा है, जहां पार्टी के पास पैसा होना चाहिए। खूब रुपया होगा तो प्रचार में कोई कमी नहीं आएगी। इसका साफ अर्थ निकलता है कि चुनाव के वक्त सबसे मंहगा लोकतंत्र सबसे रईस हो जाता है।

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