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दल युवाओं की ऊर्जा का दुरूपयोग करते हैं , सोशल मीडिया से मिला जवाब

स्वयं से कड़क चाय बनाकर ना पिया जाए तब तक संतुष्टि का एहसास नहीं होता पर भगोना गर्म था और उंगलियां उसके ताप की शिकार हो गईं। एक कहावत है ; " दूध का जला मट्ठा फूंक फूंक कर पिए" वैसे ये कहावत बिल्ली पर ज्यादा चरितार्थ है। कल मुझे आशुतोष मिश्रा की पोस्ट अंदर  तक चीरती चली गई। इनका अपना अलग अंदाज है और डिजाइनर भावनाएं परोसने से अच्छा है कि स्वयं के अंदाज में ही बात कही जाए ... जैसे कि लालू यादव का अपना अंदाज है। इन्होंने कहा कि जब भीड़ की जरूरत है तब दल और दल के विशेष लोगों को मेरी याद आयी अर्थात युवाओं की याद आती है कि बाइक लेकर आइए। हाँ भीड़ की जरूरत है और बाइक रैली है तो बाइक वाले युवाओं की पूंछ बढ़ जाएगी।

आशुतोष ने साफ कहा कि मलाई खाने के वक्त युवाओं को याद नहीं करते और भीड जुटाने वक्त युवाओं को याद कर रहे हो। सचमुच कैसे आशिक हैं कि आशिकी भी मतलबी हो चली है। मेरा चिंतन रहा है कि सचमुच युवाओं की ऊर्जा का दुरूपयोग होता है और स्वयं युवा भी अपनी ऊर्जा का सदुपयोग नहीं करते हैं। यहाँ बात किसी एक राजनीतिक दल और संगठन की बात नहीं है , बल्कि दल - दल में ऐसा ही दलदल है। इस देश में बहुत कुछ भ्रष्ट तरीके से घटित हुआ है और उत्तर प्रदेश में बाबू सिंह कुशवाहा याद आते हैं कि उन्होंने अपनी जाति के रिश्तेदार युवाओं व युवतियों को एनकेन प्रकारेण नौकरी व स्वरोजगार से लगाने का काम किया।

अनैतिक कार्य नहीं किए जाने चाहिए पर जब इतना कुछ अनैतिक घटित हुआ तो अगर दल विशेष के लोग अपने ही दल के युवाओं की ज्यादा से ज्यादा चिंता कर लेते कि इन्होंने ही वक्त पड़ने पर जिंदाबाद - मुर्दाबाद के नारे लगाए थे तो यकीन से कहा जा सकता है कि सबसे ज्यादा लंबे समय तक शासन करने वाला दल दलीय युवाओं को रोजगार संपन्न कर चुका होता और हर दल का युवा रोजगार संपन्न होकर देश और समाज के लिए चिंतन - मंथन करता। किन्तु नेताओं और दलों को भीड़ चाहिए। इसलिये जनसंख्या बढ़ाइए , बेरोजगारी बढ़ाइए ताकि भीड़ इकट्ठी हो सके। परंतु जब युवा आशुतोष हो जाता है तो वह मुंह पर थूकने जैसा जवाब देता और हर युवा को घर - घर से हर उस नेता को जवाब देना चाहिए , जो युवाओं का सिर्फ इस्तेमाल करता है।

युवा भीड़ का हिस्सा ना बनें बल्कि युवा ऊर्जा है और ऊर्जा का सदुपयोग होना चाहिए। मैंने अपने जीवन में बतौर दर्शक नरेन्द्र मोदी की रैली में राजीव तिवारी की वजह से गया था और पहली बार किसी का इस तरह से घंटो इंतजार किया था। अन्यथा मुझे टीवी पर सुन लेना अच्छा लगता है या फिर पहुंच पर होने पर संजय दर्शन करना पसंद है। वह भी कुछ लिखूंगा , कुछ करूंगा इसलिये। मेरा मानना है कि रैलियां खत्म की जानी चाहिए , यह मानवाधिकार का बहुत बड़ा शोषण है। जहाँ अनेक प्रकार के प्रलोभन व रिलेशनशिप जिम्मेदार होते हैं। स्वेच्छा से शायद ही कोई रैली स्थल तक जाता हो। भीड़ ऐसे ही जुटाई जाती है। हाँ दल और नेता का अपना असर होता है।

कुलमिलाकर युवाओं को आशुतोष से सीख लेनी चाहिए , मेरे तो सीने को चीर गई। सबसे बड़ी सीख है कि अपनी ऊर्जा का सदुपयोग करें और दुरूपयोग ना होने दें , तब आपका महत्व रहेगा।

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