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संत समाज को दिशा दिखाने वाले प्रकाश स्तंभ समान हैं

पुरुषोत्तम स्वामिनारायण संस्था के मानव उत्कर्ष महोत्सव में सहभागी बने रूपाणी

बोचासणवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बीएपीएस) द्वारा रविवार को राजकोट के रेसकोर्स मैदान में आयोजित मानव उत्कर्ष महोत्सव को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री विजय रूपाणी ने कहा कि संत समाज को दिशा दिखाने वाले प्रकाश स्तंभ के समान हैं।

बीएपीएस के अक्षर निवासी मुखिया श्री प्रमुख स्वामी महाराज का भावपूर्वक स्मरण करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रमुख स्वामी महाराज जीव मात्र की चिंता करते थे। राजकोट में जब अकाल पड़ा था, तब उन्होंने बेडी में पशु शिविर शुरू कर मूक पशुओं की सेवा की थी। राजकोट के लिए उनका कहना था कि इस कोट (परकोटा) से बाहर निकलना मुश्किल है। राजकोट को लेकर उनके मन में विशेष भाव था। यहां निर्मित भव्य और दिव्य मंदिर के निर्माण में वे निमित्त बने थे। रूपाणी ने कहा कि प्रमुख स्वामी की अगुवाई में बीएपीएस संस्था की ओर से मानव जीवन के सर्वांगीण उत्कर्ष के कार्य किए गए हैं। महोत्सव के जरिए जन-जन में संस्कारों का सिंचन और आध्यामिक चेतना की जागृति लाने के अलावा सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव जगाया गया है। उन्होंने कहा कि प्रमुख स्वामी द्वारा किए गए सद्कार्यों के लिए गुजरात हमेशा उनका ऋणी रहेगा और उस ऋण को हम कभी नहीं चुका सकते। परन्तु सद्कार्यों की ज्योत जगाने वाले कार्यक्रमों में सहभागी बनकर उस ऋण का एक अंश जरूर चुका सकते हैं।  रूपाणी ने कहा कि प्रमुख स्वामी महाराज ने समाज को व्यसनमुक्त करने के लिए निरंतर कार्य करने के साथ ही स्वच्छता को लेकर समाज को जागृत किया था। अनुयायियों में पारिवारिक भावना को बलवती बनाने तथा संस्कारिता के लिए वे सतत सेवारत रहे। मुख्यमंत्री ने राजकोट में प्रमुख स्वामी महाराज का 98वां जन्म महोत्सव आयोजित करने पर खुशी व्यक्त की और कालावड़ रोड स्वामीनारायण मंदिर द्वारा आगामी दिनों में आयोजित होने वाले महोत्सव में हर तरह से सहयोग का विश्वास दिलाया।

इस अवसर पर महंत स्वामी ने कहा कि मानव सेवा के कार्य में विजयभाई उत्साहपूर्वक दौड़ते चले आते हैं। वे बापा (प्रमुख स्वामी) से अनुग्रहित हैं। पू. बापा ने अपने खून की एक-एक बूंद मानव उत्कर्ष के लिए खर्च कर जीवन की सारी क्षणों को सेवा में बिताया था। उन्होंने कहा कि अच्छे इनसान मानव उत्कर्ष के कार्य में डूब जाते हैं और उन्हें आध्यात्मिक ऊंचाई हासिल होती है। वहीं, इस सद्कार्य में लोगों के बीच से निकलकर प्रमुख स्वामी ने सिद्धि हासिल की थी और पार निकल गए थे। उन्हें मान-अपमान से कोई वास्ता न था, वे तो बस अहर्निष सेवारत रहकर सभी जीवों के कल्याण के लिए प्रवृत्त रहते थे।

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