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ट्रेडिशनल पॉलिटिक्स को ट्रेंडिंग पॉलिटिक्स मे बदलने मे माहिर है बीजेपी

कर्नाटक चुनाव के नतीजो से बेखबर मै आज सुबह मेट्रो मे ऑफिस पंहुचने की हड़बड़ी मे था। एक दोस्त की कॉल आई और उसने जो कहा यकीन मानिए इसका मुझे पहले से अंदाजा था। दोस्त के शब्द थे- भाई अब तो कर्नाटक मे जेडीएस की भी जरूरत नही रह गई है... बीजेपी बहुमत की ओर है। मै ताकत लेता हूं नरेंद्र मोदी और अमित शाह की स्ट्रेटजी से... कमाल का बूथ मैनेजमेंट कर रही है बीजेपी। अमित शाह इज अ ब्रिलिएंट मैनेजमेंट गुरूश्. अब जबकि तस्वीर साफ है तो दोस्त के शब्द अति उत्साह में कहे गए नही लगते है। ये सच के करीब है। आम आदमी जैसा देख रहा है, जैसा महसूस कर रहा है ठीक वैसे ही खुद को अभिव्यक्त भी कर रहा है।

एक के बाद एक 21 राज्यो को जीतकर बीजेपी का मिशन विक्ट्री जारी है, जो कार्यकर्ताओ को आगामी मध्यप्रदेश, राजस्थान और 2019 के लोकसभा इलेक्शन मे बड़ी ताकत देने जा रहा है। दूसरी ओर लगातार बिखर रही कांग्रेस से कार्यकर्ताओ का अगर मोहभंग हो रहा है, तो इसे आप पार्टी की मौजूदा स्थिति, प्रभावहीन नेता और कमजोर नेतृत्व के अलावा राजनीतिक अवसरवाद भी कह सकते है। फितरत है हमारी, खासकर राजनीति मे तो सत्ता से दूर कोई भी नही रहना चाहता, फिर भला कांग्रेस के डूबते जहाज मे कोई भी क्यो रहना चाहेगा ? और लोगो को सत्ता के करीब रहने का ये अवसर इस वक्त बीजेपी लोगो को दे रही है। हर छोटे-बड़े शहरो मे 2 या 3 दशक पुराने प्रभावशाली परिवारो का पैमाना बदल गया है। नए प्रभावशाली परिवार पैदा हुए है। पहले कांग्रेस मे जो आगे बढ़ने की छटपटाहट मे नजर आते थे, उन्हे बीजेपी ने अपने साथ शामिल किया और नतीजे सबके सामने है। समीकरण जातियो और धर्म तक ही नही सिमटा है, बल्कि राजनीति से एक तय दूरी बनाकर रखने वाले भी अब राजनीतिक बहस मे सक्रिय नजर आते है। ऐसा 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद ही देखने को ज्यादा मिला है। युवा चुपचाप देख रहा है। राजनीति के मामले मे जिसे समझ नही है कहकर बड़े पीछे कर देते अब वही युवा पूरी सत्ता बदल रहा है।

पार्टी दफ्तरो के बंद कमरो और मंच तक सिमटे हुए आरोप-प्रत्यारोप और झूठ-सच अब उड़-उड़ कर हर शख्स के पास सीधे पहुंच रहे है। ये राजनीति मे टेक्नोलॉजी के स्मार्ट इस्तेमाल जैसा है। इसके उलट प्रधानमंत्री ने भी ट्रेडिशनल पॉलिटिक्स को बदलने मे कोई कसर नही छोड़ी, भले ही इसके लिए उन्हे साम-दाम-दंड-भेद का ही सहारा क्यो न लेना पड़ा हो। एक राज्य का इलेक्शन जीतने के लिए 21 रैलियां दक्षिण के किसी राज्य मे शायद ही किसी प्रधानमंत्री ने पहले की हो। इशारा साफ है जीतना है तो कुर्सी छोड़कर मैदान पर उतरना ही होगा, फिर चाहे वह स्वयं प्रधानमंत्री ही क्यो न हो। मौजूदा दौर की राजनीति मे सत्ता, कार्यकर्ताओ को संदेश भेजकर, चिठ्ठियो या फिर खानापूर्ति की रैलियो के बूते नही जीती जा सकती, बीजेपी की जीत लगातार यही बता रही है। प्रधानमंत्री और खुद अमित शाह के अलावा 10 मुख्यमंत्रियो ने कर्नाटक मे बीजेपी को सत्ता मे लाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। वोटर्स के बीच दिग्गजो की मौजूदगी माहौल बनाने के लिए काफी थी। लोगो ने येदियुरप्पा पर लगे हुए आरोपो को भुला दिया। साथ ही पीएम मोदी की पंडित नेहरू को लेकर की गई टिप्पीणी को भी भुला दिया गया। जीत सभी दाग धो देती है।

आज के दौर की बीजेपी के दो प्रत्यक्ष मोदी और शाह है, तो पर्दे के पीछे ऐसे समर्पित कार्यकर्ता भी है जो पार्टी के लिए दिन-रात एक किए हुए है। बीजेपी ने भारत मे पारंपरिक राजनीति को बदलने का जो काम 2014 के लोकसभा इलेक्शन मे शुरू किया था, वो अब ट्रेंडिंग पॉलिटिक्स है। बीजेपी के नक्शे कदम पर चलकर कांग्रेस ने पिछले दिनो क्या कुछ नही किया! सोशल मीडिया स्ट्रेटजी से लेकर मंदिर और मठों के दौरे तक बढ़ गए। इसे आप क्या कहेंगे... मैं इसे ही ट्रेंड कह रहा हूं, जिसे पहले बीजेपी ने सेट किया और इसके बलबूते अपनी जीत की इबारत रखनी शुरू की जो अभी तक जारी है। इसे केवल मोदी लहर नही कहना चाहिए बल्कि ये बदलते दौर की राजनीति है, जिसमे बाकी दल अपनी पारंपरिक सोच और कार्यशैली के चलते मिसफिट होते जा रहे है।

बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की आक्रामक कार्यशैली और अपने कार्यकर्ताओ के साथ ही पार्टी मे जुड़े नए-नए कार्यकताओ को बांधने और उन्हे जीत की एक सीधी दिशा मे काम पर लगाने के हुनर की काट ढूंढना फिलहाल तो बाकी दलो के नेताओ और स्ट्रेटजी बनाने वाले दिग्गजो के बूते से बाहर की ही बात लग रही है। आज की राजनीति जरा सी भी बदली हुई नजर नही आती, बस आज बीजेपी ने अपना तरीका बदल लिया है। आम लोगो के लिए उबाऊ और भ्रष्ट हो चुकी राजनीति मे अब लोगो को एंटरटेंनमेंट और जीत-हार का उत्साह भी नजर आता है, जो उन्हे सीधे कनेक्ट कर रहा है। एक दौर का सबसे बड़ा दल धीरे-धीरे नेपथ्य मे जा रहा है और एक नया दल भारत की किस्मत लिखने के लिए आगे बढ़ रहा है। वोटर्स हर बार आएंगे और लौट जाएंगे जश्न के बीच अपने रोजमर्रा के कामो की ओर राजनीति नए रंग दिखाती रहेगी। आरोप-प्रत्यारोप हर दौर मे जारी रहेंगे, लेकिन जो आगे बढ़कर नए आइडियाज पर काम करेगा बदलते भारत मे सत्ता की चाबी उसी के हाथ मे रहेगी।

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