< क्यों नहीं मिल रही किसान को इच्छा मृत्यु Hindi News - Breaking News, Latest News in Hindi, हिंदी में समाचार, Samachar - Bundelkhand News सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने हाल ही में शर्तो के साथ इच्छा मृत"/>

क्यों नहीं मिल रही किसान को इच्छा मृत्यु

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने हाल ही में शर्तो के साथ इच्छा मृत्यु की इजाजत दे दी है। लेकिन पिछले दो वर्षों से किसान देवराज सिंह को इच्छा मृत्यु की इजाजत नहीं मिली। वह मरने के बाद देहदान भी करना चाहता है। प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति से वह बराबर इच्छा मृत्यु की मांग रहा है फिर भी उसे सम्मानजनक मौत नहीं मिल रही है। वह कहता है कि "एक भालू को उसकी इच्छा पर मृत्यु सरकार दे सकती है मैं तो इंसान हूं मुझे इच्छा मृत्यु क्यों नहीं मिल रही?"

जनपद बांदा में शहर कोतवाली अंतर्गत पचनेही गांव का 45 वर्षीय देवराज सिंह पुत्र स्व. रंजीत सिंह राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इच्छा मृत्यु की मांग कर चुका है। वह पूरी तरह लकवाग्रस्त है अपने हाथों से कुछ भी कर पाने में असमर्थ है। मई 2010 में वह पूरी तरह लकवाग्रस्त हुआ। उस समय उसका पीजीआई लखनऊ में इलाज चल रहा था।

वह बताता है कि मेरी माता गोमती खुद बीमार है। मां की 70 वर्ष से ज्यादा की उम्र हो गयी है फिर भी वह मेरी सेवा करती है। मैं शौच, पेशाब, नहाना धोना और खाना खाने में मां की मदद लेता हूं। जो मेरे रिश्तेदार कल तक करीब थे बीमारी से दूर भागने लगे है। हम तीन भाई है। दो भाईयों की शादी हो चुकी है। मैंने शादी नहीं की। छोटा भाई ओमप्रकाश, दुर्गा नारायण डिग्री काॅलेज फतेगढ़ (फर्रूखाबाद) में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी है। दूसरा भाई रामप्रकाश नशे का आदी है। जो शराब पीने के बाद घर में सभी के साथ मारपीट करता है। घर की हालत से चिन्तित होकर 2011 में पिता की हार्ट अटैक से मृत्यु हो चुकी है। इसी दौरान 25 अक्टॅबर 2015 को मन की बात देखने से प्रधानमंत्री द्वारा पता चला कि देश में मानव अंगों की बहुत कमी है।

तब मैंने 12 मार्च 2016 को राष्ट्रपति भारत सरकार को पत्र भेजकर इच्छा मृत्यु मांगी। मैंने इस पत्र में उल्लेख किया कि भोपाल म.प्र. के चिड़िया घर में एक भालू तीन वर्षों से लकवाग्रस्त था जिसे 5 दिसम्बर 2015 को इच्छा मृत्यु दी गयी। अगर सरकार एक जानवर पर दया कर सकती है तो मुझ जैसे लाचार अपंग व्यक्ति को क्यों नहीं मिल सकती इच्छा मृत्यु। राष्ट्रपति कार्यालय ने मेरे पत्र का संज्ञान नहीं लिया गया तब मैंने 13 जून 2016 को मैंने प्रधानमंत्री को पत्र भेजा और इच्छा मृत्यु की मांग कीं। इस बीच प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति कार्यालय से मुख्यमंत्री कार्यालय पत्र भेजे गये। इसके आधार पर बांदा डीएम को भी उप सचिव मुख्यमंत्री हरिमोहन झां ने पत्र भेजकर आवश्यक कार्यवाही के निर्देश दिये गये थे लेकिन प्रशासन ने इस पर कोई एक्शन नहीं लिया, जिससे मेरे मन की बात मन में ही रह गयी। मैं अब और नहीं जीना चाहता हूं। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने भी सवाल उठाया था कि सम्मान से जीने का अधिकार माना जाता है तो क्यो न सम्मान के साथ मरने को इजाजत दी जाये।

अपनी जिंदगी से पूरी तरह हताशा हो चुके देवराज का कहना है कि पीएम और राष्ट्रपति को चिट्ठी भेजने के बाद भी कोई अधिकारी मुझे देखने तक नहीं आया। जिससे मन में पीड़ा होती है। वह कहता है कि अगर सरकार मेरा इलाज करा दे जिससे मैं अपने हाथ पैर से खड़ा हो सकूं तो फिर मुझे मरने की जरूरत ही नहीं रह जायेगी।

इलाज में सब कुछ बिक गया

देवराज के छोटे भाई ओमप्रकाश ने बताया कि भैया के इलाज में सब कुछ बिक गया। जेवरात और जमीन बिक जाने के बाद भी भाई ठीक नहीं हुआ।

फतेहगढ़ (फर्रूखाबाद) मे एक डिग्री काॅलेज में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी ने बताया कि एक मामूली सा फोड़ा होने की शिकायत पर डाक्टर को दिखाया तो उसने कानपुर भेज दिया। कानपुर में पांच दिन भर्ती रहे 90 हजार खर्च हुआ। वहां से पीजीआई लखनऊ के लिए रिफर किया जहां 7 लाख 80 हजार रूपये खर्च हुआ। कुछ जमीन भी बिक गई लेकिन हम लोगों ने हिम्मत नहीं हारी और 2013 तक इलाज कराया। लेकिन जमीन जायदाद के नाम  पर कुछ नहीं बचा तो 2013 में इलाज बंद कर दिया। तब से इलाज नहीं हुआ। प्रशासन या शासन की तरफ से भी कोई मदद नहीं मिली।

About the Reporter

अन्य खबर

चर्चित खबरें

Your Page has been visited    Times