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सतना जिला अस्पताल में भ्रष्टाचार की कहानी 

सेवा कर दी गई है , अब आपकी जो सेवा हो जमा कर दीजिए। रात का वक्त था और अचानक से मुझे सतना जिला अस्पताल जाना पड़ा था। सड़क दुर्घटना में भाई के चेहरे पर गंभीर चोट आ गई थी। किन्तु रात में ही वापस लाने के लिए मौजूद डाक्टर से बात की तो उन्होंने कहा ले जा सकते हैं। सर्जिकल वार्ड में मौजूद कर्मचारी ने जरूरी कार्यवाही पूरी कराई और सेवा के रूप में उसकी पेशकश धन लेने की थी। सुनते ही अवाक रह गया कि सतना से बाहर का समझकर भी इसने इतनी बड़ी हिम्मत की है। 

अंततः मैंने एक ही काम किया , उसे अपना कार्ड देकर बोला कभी कोई सेवा हो तो मुझे काल करना। हम ऐसी ही सेवा करते हैं। मुझे अफसोस इस बात का है कि कितनेे मजबूर गरीब लोगों को आपने लूटा होगा ? वे बेचारे रात में मजबूरी की वजह से सुविधा शुल्क प्रदान करते होगें। उसे अस्पताल का नाम भी याद दिलाया कि सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम से अस्पताल का गौरव जिंदा रखो , महापुरुष देश को आजाद कराने से लेकर नागरिकों को अच्छी जिंदगी के लिए संविधान और प्रेरक विचार प्रदान कर गए।

चिंतनीय ही कहा जाएगा कि वर्तमान में आम आदमी जो अफसर और छोटे - मोटे कर्मचारी बन जाते हैं , सभी धन कमाने की होड़ में सरकारी सेवा के सिद्धांत को भी धता बता देते हैं। इंसान क्षण भर को नहीं सोचता कि गरीब और मजबूर आदमी स्वयं वह होता तो क्या करता और कितना बुरा लगता ? उस आदमी का सर नींचे हो चुका था। उससे यह भी कहा मैं चाहूं तो अभी हंगामा खड़ा कर सकता हूँ पर अगर आप स्वयं में सुधार कर लेंगे तो सम्पूर्ण समाज के लिए अच्छा संदेश होगा। निकलते हुए नाइट ड्यूटी वाले डॉक्टर साहब से मुलाकात हुई तो मन नहीं माना और उन्हें भी कार्ड देते हुए , उसकी घिनौनी हरकत से परिचित कराया कि गरीब और मजबूर आदमी को कैसे लूटता होगा ? 

डाॅक्टर साहब ने मेरे समक्ष नाराज हो रहे थे और संभव है कि उस कर्मचारी को हिदायत अवश्य दिए हों , यदि डाक्टर की भी मिलीभगत ना रही हो। वैसे कोई भी डाक्टर इतना शायद ही गिरे कि सरकारी अस्पताल में इस प्रकार की घूस की पेशकश करे और करवाए। स्पष्ट हो जाता है कि नेताओं को दोष देने से पहले सामान्य आदमी सोच ले कि स्वयं कितने ईमानदारी से कर्तव्य का निर्वहन करते हैं। आदमी ही आदमी को पेशेवर तरीके से लूट रहा है। भ्रष्टाचार आम आदमी की नश नश में व्याप्त है। कोई सरकार रात के वक्त या किसी भी वक्त में इस तरह से अंकुश नहीं लगा सकती है और ना ही सरकार को दोष दिया जाए , जब हम ही बिजली चोरी से लेकर अपने पद का बेजा लाभ उठाते हुए सरकारी संस्थान में घूस लेने की मंशा वाली प्रवृत्ति बना चुके हैं तो भ्रष्टाचार के खिलाफ वाला प्रवक्ता अदृश्य ही रहेगा। 

इस दयनीय दशा को देखकर महापुरूषों की आत्मा अवश्य रोयेगी। अस्पताल या संस्थान का नाम महापुरुष के नाम से रख देने से होगा क्या ? , जब उनके विचारों को आत्मसात ही ना कर  सके।

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