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केन किनारे और कमासिन के कवि केदारनाथ अग्रवाल

प्रगतिशील धारा के प्रमुख कवि बाबू केदारनाथ अग्रवाल हिन्दी के एकमात्र कवि हैं जो अपने पूरे जीवन केन को कंधे पर लिए रहे। उनकी कविताओं में बाँदा जिले से बहने वाली केन नदी का चित्रण बहुतायत देखने को मिलता है। केन उनके जीवनसाथी जैसी नजर आती है।

मैं घूमूंगा केन किनारे,
यों ही जैसे आज घूमता, लहर-लहर के साथ झूमता
संध्या के प्रिय अधर चूमता, दुनिया के दुख-द्वन्द बिसारे
मैं घूमूंगा केन किनारे . . .

केन नदी पर चाहे कुछ ही कविताएं उन्होंने लिखी हों लेकिन उनकी कविताओं की लय के अन्तस्तल में केन का प्रवाह विद्यमान है, कभी स्थिर तो कभी प्रबल आवेग, और जब लगभग शान्त हो तो भी लगता है कि कुछ हलचल जरूर है। अर्थात जीवन गति रुकती नहीं है।

बुन्देलखण्ड न्यूज उनकी यादों को युवा पीढ़ी के समक्ष लाकर इस जनकवि के बारे में बताने का प्रयास कर रहा है।

1 अप्रैल 1911 को बुन्देलखण्ड में बाँदा जनपद के कमासिन में जन्में केदारनाथ अग्रवाल एक मध्यमवर्गीय परिवार के परिवेश में पले-बढ़े। पिता हनुमान प्रसाद अग्रवाल और माँ घसिट्टो देवी के दिए संस्कारों ने केदारनाथ अग्रवाल को काव्यधारा की ओर अग्रसर किया। पिता भी एक कवि थे और ‘मधुरिम’ के नाम से उनका एक काव्य संकलन भी प्रकाशित हुआ था। कमासिन के ग्रामीण परिवेश में उनका आरम्भिक जीवन बीता। आगे की पढ़ाई रायबरेली, कटनी, जबलपुर, इलाहाबाद में करने के बाद कानपुर से उन्होने वकालत की शिक्षा लेकर बाँदा में अपनी प्रैक्टिस प्रारम्भ की।

एक साक्षात्कार में उन्होंने स्वयं बताया कि ‘‘कविता मेरे घर में पहले से थी, मेरे पिता ब्रजभाषा और खड़ी बोली में कविता करते थे, मेरी चैपाल में आल्हा होता था और मेरे मैदान में रामलीला खेली जाती थी।’’ उनके अनुसार, इसका प्रभाव उनके मन-मस्तिष्क पर पड़ा और मन से काव्यधारा फूट पड़ी।

आसपास का माहौल ही काव्य के प्रति उनकी रूचि जगाने में सहायक बना। गांव का वातावरण, गांव का तालाब, हिरन का दौड़ना, देखना, नदी के बहते जल में संगीत का अनुभव करना इत्यादि बातों ने ही केदारनाथ अग्रवाल के मन में काव्यधारा का प्रवाह किया। इसी से उनके अन्दर मानवीय सौन्दर्य व प्राकृतिक सौन्दर्य को देखने की लालसा जाग उठी, उन्हें कविता का संसार मोहक लगने लगा।

इलाहाबाद में अध्ययन के दौरान उन्होंने लिखने की शुरुआत की। यहां से उनका गहरा था, जो इस बात का प्रमाण है कि उनकी सभी मुख्य कृतियां इलाहाबाद से ही प्रकाशित हुईं। ‘परिमल प्रकाशन’ के शिवकुमार सहाय उन्हें बाबू जी कहते थे व उन्हें पितातुल्य मानते थे, इसी कारण उन्हें लोग बाबू केदारनाथ कहने लगे थे। शिवकुमार सहाय जब तक जीवित रहे, वे बाबू केदारनाथ के निवास स्थान में उनके जन्मदिवस के अवसर पर गोष्ठी व सम्मान समारोह का आयोजन प्रतिवर्ष करते रहे।

बाबू केदारनाथ की कविता में छोटे बच्चे सी बोधगम्यता है। उन्होंने आसपास के वातावरण को भरपूर जिया, जो उनकी कविताओं में साफ झलकता है। शब्दों में गति और उत्साह का गजब सामंजस्य था। बुन्देलखण्ड के आदमी की व्याख्या उनके अल्हड़ शब्दों में -

बुन्देलखण्ड का आदमी 
हट्टे-कट्टे हाड़ों वाले, चैड़ी, चकली काठी वाले
थोड़ी खेती-बाड़ी रक्खे, केवल खाते-पीते जीते
कत्था, चूना, लौंग, सुपारी, तम्बाकू खा पीक उगलते
गंदे यश से धरती रंगते

गुड़गुड़ गुड़गुड़ हुक्का पकड़े, खूब धड़ाके धुआं उड़ाते
फूहड़ बातों की चर्चा के, फौव्वारे फैलाते जाते
दीपक की छोटी बाती की, मन्दी उजियारी के नीचे
घण्टों आल्हा सुनते-सुनते, सो जाते हैं मुरदा जैसे

यथार्थ का बिल्कुल नग्न चित्रण है, इसमें बाबू केदारनाथ की कलात्मक भाषा, दृष्टि या सूझ का लेशमात्र भी प्रयोग नहीं है। पर यही तल्खियां उन्हें विरल कवि बना देती हैं। उनकी कविताओं में प्रकृति का जो सहज साक्षात्कार दिखा है, उसके बिना लोक, जन और भारतीयता की परिभाषा अपूर्ण है।

एक बार उन्होंने अपने गद्य की विशेषता बताते हुए कहा था, ‘‘वकील हूं इसीलिए मेरा गद्य विश्लेषणात्मक और तथ्यपरक है। तर्क से तला मेरा गद्य जो बात कहता है, दम-खम से उभारकर, बिना शील-संकोच के, बल देकर कहता है। लेकिन कवि भी हूं इसीलिए कभी-कभी मेरा गद्य भी काव्यात्मक हो जाता है।

बाबू केदार का आक्रोश भी उनकी इस कविता से पता चलता है, कि जब रामराज्य की संकल्पना लगभग ध्वस्त हो चुकी थी-

आग लगे इस राम-राज में,
ढोलक मढ़ती है अमीर की, चमड़ी बजती है गरीब की
खून बहा है राम-राज में, आग लगे इस राम-राज में

रोटी रूठी, कौन छिना है, थाली सूनी, अन्न बिना है
पेट धंसा है राम-राज में, आग लगे इस राम-राज में

देश की परिस्थितियों पर एक और बानगी -

न आग है न पानी, 
देश की राजनीति, बिना आग-पानी के खिचड़ी पकाती है,
जनता हवा खाती है।

‘‘कविता जीवन को उदात्त बनाती है’’ मानने वाले बाबू केदार अपने समय के दर्जनों कवियों में अपनी एक अलग पहचान बनाने में सफल रहे हैं।

‘‘कवि चेतन सृष्टि के कत्र्ता हैं। हम कवि लोग ब्रह्मा हैं, कवि को महाकाल मार नहीं सकता, मैं उसी की लड़ाई लड़ रहा हूं।’’ कविता की चिरजीविता को जान चुके बाबू केदार भविष्यवाणी करते हैं -

जरा-मरण से हार न सकते
मेरे अक्षर
मेरी कविताएं गायेंगी
जनता सस्वर

यह कहते हुए बुन्देलखण्ड का एक प्रगतिशील कवि 22 जून 2000 को हमेशा के लिए चिर निद्रा में लीन हो गया, पर उनकी कविताएं चिरजीवित रहेंगी।

बुन्देलखण्ड न्यूज प्रगतिशील कवि केदारनाथ अग्रवाल को उनके जन्मदिवस पर श्रद्धापूर्वक नमन करता है।

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