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ऐसा कोई सगा नहीं..... जिसको हमने ठगा नहीं

दबंगी के साथ व्यापार-कारोबार का यह अन्दाज शायद आप समझ गए होंगे कि कहाँ का हो सकता है। फिर भी यहाँ पर खरीदारों का मेला सा लगता है। यह अन्दाज-ए-बयाँ है कानपुर का यहाँ लड्डू है ठग्गू और बदनाम है यहाँ की कुल्फी। फिर भी दुनिया दीवानी है इनके स्वाद की और चले आते हैं ठगने यहाँ। यहाँ के जायके का जादू ही है जिसके चलते जमाने को ठगने वाले ‘ बंटी और बबली ‘ अभिषेक बच्चन और रानी मुखर्जी यहाँ ठगने चले आए थे।

मट्ठा पाण्डे उर्फ रामअवतार पाण्डे जब 11 वर्ष के थे तब घर से भागकर कानपुर आ गए थे। उन्होंने कानपुर में मिठाई की दुकान खोली। एक बार महात्मा गाँधी की जनसभा सुनने पहुँचे मट्ठा पाण्डे ने जब गाँधी जी के मुँह से यह सुना कि ‘ शक्कर सफेद जहर है ‘। गाँधी जी के अनन्य भक्त मट्ठा पाण्डे उधेड़बुन में पड़ गए। उन्होंने सोचा कि इन लड्डुओं के जरिए वह लोगों के स्वाद और पैसे दोनों ठगते हैं। उन्हें अपने अन्दर एक ठग नजर आया। दुकान बन्द करने के बजाए ठगने की स्वीकारोक्ति उन्होंने अपने अनूठे अन्दाज से की। दुकान का नाम रखा ‘ ठग्गू के लड्डू ‘ और एक भारी-भरकम होर्डिंग बनवाया जिसमें उन्होंने एक धृष्टतापूर्ण स्लोगन लिखवाया:-

    ‘ ऐसा कोई सगा नहीं 
    जिसको हमने ठगा नहीं। 

जो भी मट्ठा पाण्डे की दुकान के पास से गुजरता होर्डिंग को पढ़ने के लिए थमता , पढ़कर कोई मुस्कराता तो कोई खिल-खिलाकर आगे बढ़ जाता। रामअवतार के बेटे प्रकाश पाण्डे के अनुसार धीरे-धीरे लोगों में खरीदकर खाने का चाव बढ़ा। लोगों ने सोचा एक बार खाकर देखें कि ठग्गू आखिर ठग किस तरह रहा है ? लड्डू में आखिर ठगने जैसा ऐसा क्या है ? लेकिन जिसने लड्डू खाए उसने लड्डुओं के स्वाद की तारीफ की फिर तो ठग्गू की गाड़ी चल निकली।

कानपुर के होटल लैंडमार्क के निकट खोली गई दुकान की चर्चा और लड्डुओं की बढ़ती डिमांड को देखकर प्रकाश ने कानपुर शहर में पार्वती बागला रोड़ , स्वरूप नगर , काकादेव , कैनाल रोड़ , गोविन्द नगर एवं बड़ा चैराहा समेत छह ब्राँचें खुल गई हैं। 

ठग्गू तीन प्रकार के लड्डू बनाता है। काजू , खोया और सूजी के लड्डू , मलाई व खोये के लड्डू एवं पिस्ता , बादाम , खोया और सूजी के लड्डू।

‘ बन्टी और बबली ‘ फिल्म की शूटिंग भी ठग्गू के लड्डू की दुकान में हो चुकी है। प्रकाश पाण्डे के अनुसार अभिषेक और रानी दुकान के नाम से ही ठठाकर हँस पड़े थे। उन्होंने जब लड्डू खाए तो बोले थे    ‘‘ भला यहाँ के लड्डू खाकर कौन न ठगना चाहेगा। ‘‘ 

‘ ठग्गू के लड्डू ‘ की बढ़ती लोकप्रियता व ब्राँड को बरकरार रखने के लिए प्रकाश ने 2002 में इसका पेटेण्ट करवा लिया।

ठग्गू के लड्डू जितने लोकप्रिय हैं उनकी कुल्फी उतनी ही बदनाम है। तभी तो उन्होंने काउण्टर पर स्लोगन लिखवा रखा है कि सड़कों पर जो चीजें बिकती हैं वो बदनाम होती हैं। बदनाम कुल्फी के लिए उनका स्लोगन है कि:-

    बिकती नहीं फुटपाथ पर 
    तो नाम होता टाॅप पर।

अपनी कुल्फी की तारीफ वे कुछ इस तरह करते हैं कि:- 


    चखते ही जुबाँ और 
    जेब की गर्मी गायब। 


आइसक्रीम के कारोबार में बड़ी-बड़ी कंपनियों का बोलबाला है। आकर्षक पैकिंग और विभिन्न फ्लेवरों वाली आइसक्रीम के दौर में ठग्गू की बदनाम कुल्फी को खाने का आनन्द ही कुछ और है। वे अपनी कुल्फी के लिए वैधानिक चेतावनी भी देते हैं कि इसे बाहर से घर आए किसी मेहमान को कतई न चखाएं:- 

    मेहमान को चखाना नहीं 
    टिक जाएगा। 

ठग्गू के लड्डुओं की लोकप्रियता का आलम यह है कि जब भी कोई अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच का कानपुर के ग्रीनपार्क क्रिकेट स्टेडियम में आयोजन होता है भारतीय क्रिकेट टीम के सभी खिलाड़ी लड्डू खाने यहाँ जरूर आते हैं। फिल्मों के अलावा टेलीविजन के सीरियलों की यहाँ अक्सर शूटिंग होती रहती है। धारावाहिक लापतागंज की शूटिंग हो या फिर दबंग चैनल के सीरियलों की शूटिंग या फिर खाना-खजाना की यहाँ अक्सर कलाकारों का जमघट लगा रहता है। केवल लड्डुओं का स्वाद ग्राहकों को आकर्षित करता है या फिर मार्केटिंग के लिए अपनाए गए चुटीले स्लोगनों का भी इसमें अहम रोल है। यह सूटधारी मैनेजमेंट गुरूओं के लिए भी शोध का विषय है।

कनपुरियों को खाने-खिलाने का शौकीन माना जाता है। कभी एशिया के मैनचेस्टर के रूप में विख्यात रहे कानपुर को आजकल घड़ी साबुन , रेडचीफ शूज , होजरी , लाल इमली व सुपर हाउस के उत्पादों के लिए जाना जाता हैं ऐसे में खानपान के शौकीनों के लिए ठग्गू के लड्डू व बदनाम कुल्फी को बिसराया नहीं जा सकता। तो आप भी तैयार हो जाइए ठगने के लिए।

 

आलेखः- राकेश कुमार अग्रवाल

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