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विषपान कर इस पर्वत पर भगवान शिव ने किया शयन

महाशिवरात्रि के अवसर पर गतवर्षों की भांति इस वर्ष भी ऐतिहासिक कालिंजर दुर्ग के नीलकंठेश्वर मन्दिर में शिव भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ा। भगवान शिव ने विषपान के बाद इसी स्थान पर विश्राम किया था।

कहा जाता है कि समुद्र मंथन में 14 रत्न निकले थे जिनमें एक कालकूट था। भगवान शिव उसका पान कर नीलकण्ठ हो गए। कालकूट की गर्मी को शांत करने के लिए उन्होंने स्वर्गगाह मे शयन किया। काल को जर (नष्ट) करने वाला तीर्थ कालिंजर बन गया। चारो युगों में इस स्थान का नाम प्रसिद्ध रहा।


 जैसे -
सतयुगों रत्न कौटिश्च, त्रेतायाम महदगिरि।
द्वापरे पिंगलों नाम, कलों कालिंजरः।।

विल्सन के अनुसार ऋग्वेद में इसका उल्लेख तपस्थल के रूप में प्राप्त है। रामायण काल में इसके समीप महेन्द्र पर्वत महार्षि अगस्त्य का आश्रम था। महाभारत के वन पर्व में मोधावी पर्वत लोक विश्रुत बताया गया है। कालीजंर पर्वत के जिस स्थान पर शंकर जी ने अपना स्थान बनाया उसके ठीक विपरीत दिशा मे काली का स्थान था। चंन्देल राजाओं ने साक्ष्य संग्रहीत कर भगवान नीलकंठ और काली के बीच औपचारिक विवाह सम्पन्न कराया।

शिव और शक्ति के संयुक्त तीर्थ होने के कारण कालिंजर शिव और काली का विवाह स्थल भी माना जाता है। भगवान सदाशिव कालकूट की तप्तता के शांत एवं शीतल करने हेतु अगाध सरोवर में लेटे जो नीला हो गया और नील सरोवर कहलाया। इस धार्मिक स्थल पर हर साल कार्तिक पूर्णिमा और शिवरात्रि को शिवभक्तों की भारी भीड़ रहती है।

 

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