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विक्रमपुर में वैज्ञानिकों द्वारा अग्रिम पंक्ति प्रदर्षन चना का अवलोकन

कृषि विज्ञान केन्द्र पन्ना द्वारा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिषन के अन्तर्गत समूह अग्रिम पंक्ति प्रदर्षन चना ग्राम विक्रमपुर में 10 कृषकों के खेतों पर डाले गये है। डाॅ. बी. एस. किरार, वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख एवं डाॅ. आर. के. जायसवाल वैज्ञानिक द्वारा कृषकों रामादीन गोड़, भोपाल सिंह परिहार, जयहिन्द सिंह, विसाल सिंह भदोरिया, बृजेष नायक, षिवराजी सेना आदि के साथ प्रदर्षन खेतों का भ्रमण किया गया और कृषकों से प्रदर्षन में अपनायी गयी तकनीक पर विस्तार से चर्चा की गयी। कृषकांे ने चना प्रदर्षन तकनीक के अन्तर्गत प्रमुख बिन्दुओं अन्तर्गत उन्नत किस्म आर.वी.जी. 203 जो उकठा एवं काॅलर राट रोग प्रतिरोधी अधिक उत्पादन और अधिक फैलने के कारण असिंचित क्षेत्र के लिये उपयोगी आदि विषेषताआंे पर चर्चा की गयी।

उन्होंने बताया कि बुवाई पूर्व जैव उर्वरक राइजोबियम, पी.एस.बी. एवं ट्राइकोडर्मा कल्चर द्वारा/10 मिली लीटर प्रति किग्रा. बीज दर से बीजोपचार किया गया। राइजोबियम एवं पी.एस.बी. कल्चर द्वारा बीजोपचार करने से पौधों की जड़ों में गठानांे का अधिक निर्माण हुआ और इन गठानों में राइजोबियम जीवाणु पाये जाते है जो वायुमंण्डलीय नत्रजन को फसल को उपलब्ध कराते है। इसके अतिरिक्त ट्राइकोडर्मा कल्चर को 2 लीटर प्रति एकड़ की दर से 50 कि.ग्रा. गोबर की खाद में मिलाकर बुवाई पूर्व मिट्टी में मिलाया गया जिसके कारण चना फसल उकठा रोग से प्रभावित नही हुआ। वैज्ञानिकों ने सभी जैव उर्वरको के कार्य एवं इसके लाभ से किसानों को अवगत कराया।

कृषकांे ने चने की उन्नत तकनीक पर वैज्ञानिकों से चर्चा की उन्होंने बताया कि स्यूडोमोनास कल्चर का छिड़काव करने से फसल की बढ़वार एवं शाखाओं में अच्छी वृद्धि हुयी है। स्थानीय प्रजाति एवं पद्धति से चना की खेती कमजोर एवं उकठा रोग से प्रभावित भी है। चर्चा के दौरान कृषकों को फसल में ‘टी‘ आकार की खूटिया 10-15 प्रति एकड़ लगाने से इल्ली नियंत्रण में सहायक होती है। कीट भक्षी पक्षिया खूटी पर बैठकर इल्लियों को खाकर नियंत्रण करने में मददगार साबित होती है।



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