जब पानी दे नहीं सकते तो मोतियारी का पानी क्यों छीन रहे हो ?

बुन्देलखण्ड न्यूज की टीम ने जब इस गांव के जलस्रोतों की हकीकत देखी तो आश्चर्यजनक तथ्य सामने आये। जिस जलधारा को बचाने के लिए पूरा गांव एकत्र है, उस बात को सरकारी अधिकारी आखिर क्यों नहीं समझ पा रहे? पानी बचाने की इस मुहिम में बुन्देलखण्ड न्यूज मोतियारी के ग्रामीणों के साथ है।


  • कुछ लोग हैं जो दुश्मन हैं प्रकृति के
  • कुछ लोग हैं जो नहीं चाहते कि बुन्देलखण्ड पानीदार हो जाये
  • कुछ लोग हैं जो ये चाहते हैं कि बुन्देलखण्ड के लोग हमेशा बेचारे रहें, लाचार रहें। गरीब रहें, बेबस रहें।

ये एक दिन की बात नहीं है, ये सिलसिला लगातार चला आ रहा है। तभी तो प्राकृतिक जलस्रोतों को सुखाने की भी जद्दोजहद चल रही है। यहां सवाल है कि जब पानी दे नहीं सकते तो उसे छीनने का हक किसने दे दिया? और क्यों?

क्यों एक पानीदार गांव का पानी सुखाने की योजना चलाई जा रही है। प्रकृति ने जो यहां दे रखा है, उससे ये गांववासी अपनी प्यास बुझा लेते हैं। तो उसे डिस्टर्ब करने की क्या जरूरत आन पड़ी। 

दरअसल ये कहानी है मोतियारी गांव की। बाँदा जनपद के सुदूर नरैनी तहसील का एक गांव मोतियारी। जहां प्रकृति ने वो व्यवस्था कर रखी है कि गांववासियों को पानी के लिए भटकना नहीं पड़ता। पूरा गांव प्रकृति के दिये इस वरदान से खुश है। पर उनकी खुशी कुछ लोगों से देखी नहीं गयी और उन्होनें उन्हीं जलस्रोतों पर एक चेकडैम बना दिया। उसके बाद गांव की परेशानी दिन-ब-दिन बढ़ने लगी। जिस मात्रा में जल अपने पूरे वेग में बहता हुआ पूरे गांव की प्यास और आवश्यकता की पूर्ति करता था, उसमें बेहद कमी आ गयी। हालांकि चेकडैम बनने से उनका क्या फायदा हुआ, जिन्होंने इसकी रूपरेखा तैयार की थी, ये तो वही जाने। चूंकि सरकारी बजट के बंदरबांट का जो सिलसिला आजादी के बाद चल रहा है, वह बदस्तूर जारी है। बावजूद इसके देश की तस्वीर को सकारात्मक और देशभक्त बनाने का दावा करने वाली पार्टी की सरकार में भी प्रकृति की इस व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने की योजना बनाना समझ से परे है। 

मोतियारी गांव में अब एक बार फिर से दूसरा चेकडैम बनाने की तैयारी चल रही है और इसी बात पर पूरा गांव नाराज़ है। लघु सिंचाई विभाग की इस जलसुखाऊ योजना पर विरोध करने के लिए अब पूरा गांव एकजुट भी है। बुन्देलखण्ड न्यूज की टीम जब इस गांव पहुंची तो पूरा गांव जैसे हमारी ही राह तक रहा था। क्या बूढ़े और क्या जवान? सभी हमें वह जगह दिखाने ले गये जहां दूसरे चेकडैम का निर्माण चल रहा था, लेकिन गांववालों के विरोध और अचानक हुए लाॅकडाउन के कारण काम बन्द था। काम दोबारा न चालू हो, इसके लिए गांववाले एक जुट होकर अपने गांव को बचाने में लगे हैं। क्योंकि उन्हें मालूम है कि यदि ये चेकडैम बना तो बचे-खुचे जलस्रोत भी सूख जायेंगे।

बुन्देलखण्ड में जब प्रचण्ड गर्मी पड़ती है, तब तालाब, कुएं और नदियों का पानी तक सूख जाता है। ऐसे में पानी के लिए इंसान के साथ जानवर भी भटकते हैं। इसीलिए बुन्देलखण्ड में जल संरक्षण के तमाम उपाय सदियों से किये जाते रहे हैं। बावजूद इसके प्रकृति यहां मेहरबान भी है। जगह-जगह प्राकृतिक जलस्रोत यहां के निवासियों और जीव-जन्तुओं की प्यास बुझाते हैं। तब प्राकृतिक जल स्रोत ही उनकी प्यास बुझाते हैं, ऐसे ही दर्जनों जल स्रोत मोतियारी में भी हैं। इन जल स्रोतों से निकलने वाला पानी ना सिर्फ हजारों एकड़ जमीन की सिंचाई करता है बल्कि गांव वालों की और मवेशियों के प्यास भी बुझाता है। लेकिन अब इस पर लघु सिंचाई विभाग की गिद्ध दृष्टि जम चुकी है। ये विभाग वो योजना बना चुका है, जिससे ये प्राकृतिक जलस्रोत पूरी तरह से सूख जायेंगे। आखिर ये कौन सा विकास है, जो इनका पानी छीनने से हासिल होगा?

गांव के समाजसेवी रामस्वरूप मिश्रा बताते हैं कि 8 साल पहले भी इन जल स्रोतों से लगभग 200 मीटर ऊपर एक चेकडैम बनाया गया था। उसके बाद इसके ऊपर के सारे प्राकृतिक जलस्रोत सूख गये। अब यदि दूसरा चेकडैम भी बन गया तो बचे-खुचे जलस्रोत भी सूख जायेंगे। और पूरा गांव पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसेगा।

हमने भी देखा कि कैसे जमीन से लगातार पानी निकल रहा है। छोटे-छोटे जलस्रोतों से पानी का एक बड़ा नाला कैसे बह रहा है। हम आपको भी यही दिखाना चाहते हैं। 

आप भी फैसला कीजिये कि क्या ऐसे जलस्रोतों को बन्द करने से प्रकृति का भला होगा? क्या गांव का भला होगा? क्या गांव के जीव-जन्तु भी खुशहाल रह पायेेंगे?

मोतियारी गांव के लिए प्राकृतिक जलस्रोत और अकूत पानी का भंडार आस्था का भी केंद्र है। यहां के लोग इसी पानी से बह रहे नाले का पानी खेतों की सिंचाई में इस्तेमाल करते हैं। साथ ही इसी पानी में ग्रामीणों के सभी संस्कार भी संपन्न होते हैं। ये प्राकृतिक नाला इस गांव की छोटी से नदी है जो लगभग 5 किलोमीटर आगे जाकर बागै नदी में मिल जाती है। जिससे बागै नदी का भी जलस्तर बढ़ता है।

गांववासी इस सरकारी परियोजना का मंतव्य नहीं समझ पा रहे हैं। वो ये नहीं समझ पा रहे हैं कि पढ़-लिख कर जो अधिकारी कर्मचारी कुर्सी पर बैठे हैं वो ज्यादा समझदार हैं, जिन्होंने पानी सुखाने की ये योजना बनायी है या वे स्वयं जो कम पढ़े होकर भी जानते हैं कि चेकडैम बनने से उनके गांव का पानी सूख जायेगा। 

गांववासी नेताओं के रवैये से भी नाखुश हैं। वो अपने क्षेत्र के विधायक से भी नाराज हैं। वो भी आश्वासन देकर गये थे पर हुआ कुछ नहीं।

अब तो गांववासी अपने हक के लिए आन्दोलन के लिये भी आमादा हैं। उनका कहना है कि चेकडैम वे नहीं बनने देंगे।

उधर विभाग के अधिकारी भी काम फिर से शुरू कराने की बात करते हैं। सहायक अभियंता प्रमोद मिश्रा कहते हैं कि विभाग ने 28 लाख रूपये स्वीकृत किया है, पर गांव वालों के विरोध के कारण काम रोक देना पड़ा। ऊपर अधिकारियों को अवगत कराया है, जैसे ही आदेश मिलेगा, वैसे ही काम शुरू करेंगे।

ग्रामीणों का मानना है कि चेकडैम बनाने से बहते हुए पानी में ठहराव हो जाता है, जिससे जल स्रोतों में मिट्टी पड़ जाती है और वह जल स्रोत बंद हो जाते हैं। अगर पानी को रोका ना जाए तो जल स्रोत बंद नहीं होते है। विधायक राजकरन कबीर को भी अवगत कराया गया पर उनका टालमटोल रवैया समझ से परे है।

अब देखना है कि ग्रामीणों का विरोध और लघु सिंचाई विभाग के बीच जल स्रोतों को नष्ट करने और बचाने की चल रही जंग का नतीजा क्या होगा? क्या ग्रामीण जल स्रोत को बचा पाएंगे? 

फिलहाल हमने आपके सामने मोतियारी की हकीकत रख दी है। फैसला आपको भी करना है, ऐसे जलस्रोतों पर लगी विभागीय गिद्धदृष्टि को आपको भी पहचानना है। हो सकता है कि आपके आसपास भी ऐसी ही कोई प्रकृति विरूद्ध कार्ययोजना को अंजाम दिया जा रहा हो। सतर्कता आपकी भी आवश्यक है।